हैप्‍पी अभिनंदन में सोनल रस्‍तोगी


जुलाई 2009 की कड़कती दोपहर में ''कुछ कहानियां कुछ नज्‍में'' नामक ब्‍लॉग बनाकर गुड़गांव की सोनल रास्‍तोगी ने छोटी सी कविता 'नम आसमान' से ब्‍लॉग जगत में कदम रखा। तब शायद सोनल ने सोचा भी न होगा कि ब्‍लॉग दुनिया में उसकी रचनाओं को इतना प्‍यार मिलेगा। आज हजारों कमेंट्स, सैंकड़े अनुसरणकर्ता, सोनल की रचनाओं को मिल रहे स्‍नेह की गवाही भर रहे हैं। सोनल की हर कविता दिल को छूकर गुजर जाती है, चाहे वो सवाल पूछ रही हो, चाहे प्‍यार मुहब्‍बत के रंग में भीग रही हो, चाहे मर्द जात की सोच पर कटाक्ष कर रही हो। सोनल की कलम से निकली लघु कथाएं और कहानियां भी पाठकों को खूब भाती हैं। आज हैप्‍पी अभिनंदन में हमारे साथ उपस्‍िथत हुई हैं ''कुछ कहानियां कुछ नज्‍में'' की सोनल रस्‍तोगी, जो मेरे सवालों के जवाब देते हुए आप से होंगी रूबरू। तो आओ मिले ब्‍लॉग दुनिया की इस बेहतरीन व संजीदा ब्‍लॉगर शख्‍सियत से।

कुलवंत हैप्‍पी- मैंने आपका ब्‍लॉग प्रोफाइल देखा। वहां मुझे कुछ नहीं मिला, तो फेसबुक पर पहुंच गया। वहां आपने कुछ लिखा है। मैं कौन हूँ ? इसका जवाब जब मिल जाएगा तब अगला सवाल पूछूंगी। क्‍या आपको इसका जवाब अभी तक नहीं मिला। अगर मिल जाए तो अगला सवाल क्‍या होगा?

सोनल रस्‍तोगी-मुझे खुद से सवाल करने का शौक है, हर घटना पर हर मौके पर मैं खुद से बात करती हूँ, हर पात्र के ज़हन में उतरती हूँ, कभी कभी इसी जद्दोजहद में खुद को भूल जाती हूँ, मेरे होने का उद्देश्य कुछ साफ़ तो हुआ है.. अगला सवाल मेरे अस्तित्व की सार्थकता से जुड़ा होगा।

कुलवंत हैप्‍पी - जुलाई 2009 की चीखती दोपहर में आपने 'कुछ कहानियां, कुछ नज्‍में' ब्‍लॉग बनाकर 'नम आसमान' से ब्‍लॉग जगत दस्‍तक दी। अब उस बात को चार साल होने जा रहे हैं। इस दरमियान ब्‍लॉग जगत में गुटबाजी एवं बहुत कुछ हुआ। कभी आप ब्‍लॉग विवादों से परेशान हूं या इसका शिकार?

सोनल रस्‍तोगी - चार साल के छोटे से समय में मुझे एक नई दुनिया दिखाई दी जिसे लोग आभासी दुनिया कहते हैं, पर ये आभासी नहीं है, मुझे यहाँ बहुत से वास्तविक हमखयाल दोस्त मिले, ढेर सारा पढ़ने को और सीखने को भी, रही बात विवादों की तो उनसे बस एक तकलीफ होती है...लोगों की ऊर्जा सृजन की बजाय ..विवादों को हवा देने में व्यर्थ चली जाती है और हम जैसे पाठक अच्छी पोस्टों की प्रतीक्षा करते हैं, अगर कुछ लंबा विवाद चल गया तो, ब्लॉगजगत से ब्रेक लेकर कोई किताब उठा लेते हैं और इंतज़ार करते है सब सामान्य होने का।

कुलवंत हैप्‍पी- मैं जब आपका ब्‍लॉग पढ़ रहा था। वहां हर रचना एक से बेहतर एक थी। मगर प्रतिक्रियाओं में बहुत बड़ा फर्क नजर आया। कुछ अच्‍छी पोस्‍टें भी कम कमेंट्स से गुजारा कर रही थी। क्‍या आप केमेंट्स के आधार पर पोस्‍ट का स्‍तर तय करती हैं या इसके बारे में आपका कोई अपना मापदंड है?

सोनल रस्‍तोगी - तारीफ का शुक्रिया, मेरी रचनाएं ब्लॉग बनने के बाद मेरी डायरी से निकल कर वेब पर आ गई, कमेंट्स प्रोत्साहित तो करते हैं पर उनकी संख्या ज्यादा मायने नहीं रखती, अगर एक भी कमेन्ट ऐसा मिल गया जिसने रचना की आत्मा को समझ लिया बस दिल को संतुष्टि मिल जाती है, मेरी पोस्ट मेरे दिल से मेरी कल्पनाओं से जन्मी होती है, वो तो बस मेरी अभिव्यक्ति है ...जो मुझे सुकून देती है ...स्तर आप लोग तय करें [:-)]

कुलवंत हैप्‍पी- ''हर दिल की तमन्ना होती है, की उसको कोई प्यार करे''। कुछ याद आया सोनल जी। यह आपकी ही एक रचना की एक पंक्‍ित है, जो आपको कटहरे में खड़ा कर पूछ रही है, प्‍यार के बारे में आपकी वैसी ही राय है जैसी आपकी कलम से निकलती है या फिर फर्क है।

सोनल रस्‍तोगी- जो अहमियत रसगुल्ले में रस की होती है, वही मेरी लेखनी और ज़िन्दगी में प्यार की है, प्यार के बिना कोई भावना जन्म ही नहीं लेती दर्द, दुःख, जलन, क्षोभ, मुस्कराहट, सब कहीं न कहीं प्यार से जुड़े हैं, और सच ही तो है अगर नहीं तो आप ही बताइए ऐसा कौन सा दिल है जो प्यार नहीं चाहता। आपने शायद मेरी रचना "मोहब्बत मोहब्बत दिन रात मैं लिखूंगी" नहीं पढ़ी, वैसे भी मेरी आधे से ज्यादा रचनाएं प्यार पर ही है, प्रेम की गायिका हूँ मैं।

कुलवंत हैप्‍पी - आपके प्रोफाइल पर चंद लाइनों के सिवाय कुछ नहीं मिला, इसलिए ब्‍लॉग जगत यह जानना चाहता है कि आप ब्‍लॉगिंग के अलावा असल जिन्‍दगी में और किन किन जिम्‍मेदारियों को अपने कंधों पर उठाकर चल रही हैं?

सोनल रस्‍तोगी - मैं फर्रुखाबाद में जन्मी, माँ से पढ़ने का शौक मिला, स्कूल में लेखन को प्रोत्साहन, विवाह के बाद गुडगाँव आई, बस दिन में जॉब और फुर्सत के पलों में लेखन। मैं चाहती हूँ के ब्लॉग जगत मुझे मेरे लेखन से जाने बस मैं भी अपनी कहानी की तरह "रहस्यमयी" रहना चाहती हूँ।

कुलवंत हैप्‍पी - ब्‍लॉग जगत पर जब भी कविताएं पढ़ने निकलता हूं तो कवित्रियों के ब्‍लॉग पर जाता हूं, मुझे लगता है कि कवियों से बेहतर होती है कवित्रियां, आपका इस बारे में क्‍या विचार है?

सोनल रस्‍तोगी - कवि या कवियत्री मुझे कभी फर्क नहीं दिखा, उत्कृष्ट रचनाएं बस उत्कृष्ट रचनाएं होती हैं जो अपने पाठक का मन मोह लेती हैं कविता हो या कहानी, हर व्यक्ति की कविता कहने की विशेष शैली होती है, भावनाओं की पकड़ होती है जो आपको बाँध लेती है।

कुलवंत हैप्‍पी - ब्‍लॉग जगत को आप अभिव्‍यक्‍ित का एक बेहतर माध्‍यम मानती हैं या नहीं ?

सोनल रस्‍तोगी- ब्लॉगजगत ने डायरी के पन्नो में छुपी रचनाओं को आकाश सा विस्तार दिया है ना केवल अभिव्यक्ति बल्कि रचनाओं की समीक्षा, सुधार और प्रशंसा के अवसर दिए हैं और इससे मिलने वाला आत्मविश्वास आपको आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है, ब्लॉगजगत ने हमें वो करने का मौक़ा दिया है जो हम हमेशा से करना चाहते थे पर अपनी व्यस्तताओं के चलते नहीं कर पा रहे थे।

कुलवंत हैप्‍पी - आपकी जिन्‍दगी का कोई ऐसा लम्‍हा हम से सांझा करें, जो कुछ सीख देता हो, जो थोड़े में बहुत कुछ कहता हो।

सोनल रस्‍तोगी - ज़िन्दगी के ऐसे कई अनमोल लम्हों की पोटली मेरी माँ ने मुझे सौंपी है एक बार मुझे कहीं से एक जासूसी उपन्यास मिल गया, मैंने उसे पढ़ना शुरू किया थोडा अश्लील था मेरी माँ ने वो मुझसे माँगा और समझाया "अच्छा पढ़ोगी तो अच्छा सोचोगी, अच्छा सोचोगी तो अच्छा बोलोगी और अच्छा ही लिखोगी, आपकी भाषा और आपका व्यवहार और आपकी सोच पारिवारिक माहौल के साथ आप क्या पढ़ते है इसपर निर्भर करता है।

कुलवंत हैप्‍पी - कुछ दिन पहले वंदना की एक कविता को लेकर ब्‍लॉग जगत में हो हल्‍ला हो गया था। कुछ वैसी ही आपकी कविता है ''देह से परे''। जब महिलाएं प्‍यार मोहब्‍बत की कविताएं लिखती हैं तो वाह वाह लेकिन जब वह मर्दों की सोच पर कटाक्ष करने लगती हैं तो हो हल्‍ला क्‍यूं होने लगता है, इस बारे में आप क्‍या कहती हैं?

सोनल रस्‍तोगी - अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी को है, किसी विषय पर हर व्यक्ति स्वतंत्र है अपने विचार रखने के लिए, अगर आपको नापसंद है या आपके विचारों से मेल नहीं खाते तो मत पढ़िए, टी वी, सिनेमा हर जगह यही बात लागू होती है चाहे "डर्टी पिक्चर" हो या "लज्जा " अगर कोई अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र है तो आप उसे ना देखने या ना पढ़ने के लिए भी स्वतंत्र हैं।

कुलवंत हैप्‍पी - ब्‍लॉग जगत के नाम एक संदेश, जो आप देना चाहें।
सोनल रस्‍तोगी - हम सभी को एक सांझा मंच मिला है सार्थक लिखने और पढ़ने के लिए, छोटे बड़े शहरों और घटनाओ को वहीं के बाशिंदों की आँखों से देखने और जानने के लिए। हमारे उद्देश्य और सरोकार बहुत बड़े है, अभी तो शुरूआत है।

सोनल रस्‍तोगी जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया, जो आप ने अपने कीमती समय से समय निकालकर हम से बातचीत की।

आओ कौओं का गला मरोड़ें : पर कोयल नहीं चाहती हैं


 

 कौओं का गला मरोड़ना चाहते हैं
कौए भी
कौए नहीं देख सकते
एक दूसरे को
यह सच नहीं है
एक मर जाता है
तो जिंदा कौए
लेने के लिए उसका बदला
तुरंत करते हैं सभा
और कर देते हैं हमला
उन्‍हें क्‍या मतलब हो कोई
कमला, विमला, सुशीला
नहीं देते हैं सूचना
नहीं करते हैं रचना
न करते हैं पूजा
बस हमला, हमला और हमला
कोई नहीं करता इंतजार
बम ला, कम ला, अमला।

गला मरोड़ने में भागी हो चाहे कोयल
पर कौए नहीं छोड़ते जिंदा
कोयल ऐसा मौका नहीं आने देती
कोयल को कौए से काम है
कोयल को लेनी मस्‍ती है
कौए ने सेने हैं उसके अंडे
फिर आएंगे बच्‍चे
कौआ को कहेंगे मामा मामा
और उड़ जाएंगे
लेकिन कौए नहीं शर्माते हैं
अगली सुबह फिर
कोयल के अतिथि के
आगमन का समाचार
मुंडेर पर बैठकर सुनाते हैं।

कौए समझदार हैं
इंसान कौआ भी न बन सका
वह कोयल का ही हुआ
कौओं का क्‍यों न हो सका
हुआ तो कौओं का भी
लेकिन दोस्‍त नहीं, दुश्‍मन
वास्‍तविक जिंदगी में
फेसबुक में नहीं।

जबकि नहीं मालूम है
कुछ कोयलों को
कि फेसबुक क्‍या होता है
या डर लगता है उन्‍हें
उन कौओं की तरह
जो फेसबुक को करते हैं इस्‍तेमाल
फेकबुक की तरह।

पक्षियों को बुक की जरूरत क्‍यों पड़ी
क्‍या वह बुक उन्‍होंने कभी पूरी पढ़ी
यह पढ़ना वह पड़ना फिर लड़ना
बुराई के प्रसार के लिए लड़ना भिड़ना
समाज में अच्‍छाई मानी जा रही है
टीआरपी न्‍यू मीडिया की
इसी से स्‍वीकारी जा रही है।


कथा बहुत लंबी है
सुन रहे हैं
कौए अब चहचहा रहे हैं
जबकि वे चिडि़या नहीं हैं
पर मिमिक्री करना भी तो
एक अद्भुत मनमोहिनी कला है
इस कला से ही कितनों का गला
तर होता है, असर होता है
वही सर होता है
लेकिन सिर नहीं होता।

इस कथा को आप चाहें
तो आगे बढ़ाएं
इसे पंचतंत्र कहें
या तंत्र पचों का मानें
माने या न मानें
पर असलियत को अपनी जरूर मानें
इंसानियत को यूं न भुला दें ।

कौए या कोयल इंसान नहीं हैं
लेकिन उनके कर्म इंसान से सुथरे हैं
उनके जानवरों की तरह नहीं नखरे हैं
पक्षियों और जानवरों से यदि हम
गुणग्राहकी सीख लें
तो दुर्गुणों से बच जाएंगे
पर इस पर कोई अमल
इंसान कर पाएंगे
यह संदेह नहीं, सच है।

विशेष : प्रतिक्रिया देने के लिए प्रतिक्रिया देने की खानापूरी न करें। समझ आए तो बेबाक होकर कहें। वरना तो चुप ही रहें। जब पीएम चुप रह सकते हैं तो आप क्‍या हिंदी ब्‍लॉग संसार के पीएम से कम हैं ?

वटवृक्ष: वटवृक्ष का ब्लॉगर विशेषांक और परिकल्पना सम्मान

हिन्‍दी चिट्ठाकारी में साहित्‍य के नए-नए ठेकेदार और ठेकेदारनियों इस कविता को पढ़कर अब सबको आस्‍तीन का सांप क्‍यों सूंघ गया है


नि:संदेह देह देह ही है देह भी नहीं नि:संदेह

क्‍यों नहीं कर रहे हैं आप

अब इस कविता का खुलकर विरोध
(पोस्‍ट के ऊपर लाल शीर्षक पर क्लिक करके कविता पर पहुंचा जा सकता है।)
क्‍यों नहीं बतला रहे हैं इसे शब्‍दों से
जबरदस्‍ती का कुकृत्‍य/जादूगरी का प्रताप
या मिल रहा है इसमें आनंद
और यह कविता साहित्‍य के
सभी तय मानकों पर
उतरती है खरी। 

या लग रही है डर की झुरझुरी
कब तक बुरा बुरा ही करते रहेंगे
अच्‍छाईयों के कब तक गले पड़े रहेंगे
या कसता महसूस हो रहा है फंदा
इसलिए नहीं चला रहा है 
इस पर कोई आरी
और न चला रहा है रंदा
चिट्ठाकारी का एक भी बंदा । 

लेकिन बंदा बंदा है
इसे तय कौन करेगा
क्‍या इसके लिए भी
निविदाएं की जाएंगी आमंत्रित
और खोला जाएगा टेंडर
अथवा लग रहा है फियर (Fear)
जितने भी हैं सब डियर (Deer)।

या चनों ने भुनभुनाना बंद कर दिया है
चमेलियों की पुष्‍प सुगंधों ने
महकना बंद कर दिया है
या दोष आ गया है नाक की घ्राण शक्ति में।


हिंदी ब्‍लॉगर अवश्‍य जानें - हेमोग्‍लोबिन : एक तथ्‍य


पुण्य प्रसून बाजपेयी: न्यूजलॉड्री डॉट कॉम के लिए बातचीत

आज बिलकुल अलग तरीके से तेताला पर चर्चा प्रस्तुत है.देश के सामयिक विषयों,मीडिया और पत्रकारिता  पर पुण्य प्रसून बाजपेई जी की बातचीत !

पुण्य प्रसून बाजपेयी: न्यूजलॉड्री डॉट कॉम के लिए बातचीत

हैप्‍पी अभिनंदन में रविश कुमार


हैप्‍पी अभिनंदन में इस बार आपको एनडीटीवी के रिपोर्टर से एंकर तक हर किरदार में ढल जाने वाले गम्‍भीर व मजाकिया मिजाज के रवीश कुमार से मिलवाने की कोशिश कर रहा हूं, इस बार हैप्‍पी अभिनंदन में सवाल जवाब नहीं होंगे, केवल विशलेषण आधारित है, क्‍योंकि एक साल से ऊपर का समय हो चला है, अभी तक रवीश कुमार, जो नई सड़क पर कस्‍बा बनाकर बैठें हैं, की ओर से मेरे सवालों का जवाब नहीं आया, शायद वहां व्‍यस्‍तता होगी। हो सकता है कि उनके कस्‍बे तक मेरे सवाल न पहुंच पाए हों, या फिर उनके द्वारा भेजा जवाबी पत्र मुझ तक न आ पाया हो।

फिर मन ने कहा, क्‍या हुआ अगर जवाबी पत्र नहीं मिला, क्‍यूं न रवीश कुमार से पाठकों व ब्‍लॉगर साथियों की मुलाकात एक विशलेषण द्वारा करवाई जाए। रविश कुमार, ब्‍लॉग सेलीब्रिटी नहीं बल्‍कि एक सेलीब्रिटी ब्‍लॉगर हैं, जिनके ब्‍लॉग पर लोग आते हैं, क्‍यूंकि सेलीब्रिटियों से संबंध बनाने का अपना ही मजा है। मगर रवीश कुमार ने साबित किया है कि वह केवल सेलीब्रिटी ब्‍लॉगर नहीं हैं, बल्‍कि एक सार्थक ब्‍लॉगिंग भी करते हैं।

मैं पहली बार उनके ब्‍लॉग पर एक साथी के कहने पर पहुंचा था, जो उम्र में मुझे काफी बड़े थे, उनको पता था कि मैं ब्‍लॉग लिखता हूं, उन्‍होंने मुझे पूछा कभी रवीश को पढ़ा है, तब मैं नहीं जानता था कि रवीश कुमार कौन हैं। मैं उनको खोजा और कस्‍बा नामक ब्‍लॉग पर पहुंचा, यह कस्‍बा नई सड़क स्‍थित है।

उनका ब्‍लॉग उनकी नौकरीपेशा जिन्‍दगी से बिल्‍कुल अहलदा हैं, सच में, क्‍यूंकि वहां पर वह वो सब नहीं कर सकते, जो ब्‍लॉग जगत में वह बेबाक लिख सकते हैं, हर आदमी को आजादी चाहिए, चाहे वह आम आदमी हो या एक सेलीब्रिटी। कस्‍बा के रहवासी रवीश नरेंद्र मोदी से कोसों मील की दूरी रखते हैं, अगर उनके अगेंस्‍ट कोई न्‍यूज या स्‍टोरी मिल जाए तो उनकी कलम लिखते हुए आग उगलती है, वह केवल रिपोर्टर या एंकर ही नहीं, एक कवि भी हैं, जी हां, उनके ब्‍लॉग पर उनके भीतर का दर्द उनकी कविताओं से ही उजागर होता है। उनकी कविताएं बताती हैं कि वह मीडिया की आज की स्‍थिति से थोड़ा सा खफा हैं।

वो राजनीतिक मुददों पर भले प्रसून जी के मुकाबले में न खड़े होते हों, लेकिन सामाजिक मुददों को उनसे बेहतर कोई नहीं हैंडल कर सकता, उनके भीतर एक आम आदमी बसता है, जो सामाजिक मुददों को बेहतरीन तरीकों से जाना है और उठता है। वैसे उनको मजा लेने की बड़ी आदत है, यह आदत आप उनके प्राइम टाइम शो के दौरान कभी भी देख सकते हैं। आजकल उनको ब्‍लॉग से ज्‍यादा माइक्रो पोस्‍ट में मजा आता है, जो फेसबुक पर देखी जा सकती है, यह व्‍यस्‍त समय में अपनी बात कहने का आसान व सुखद तरीका है। वह कभी कभी फोटो से भी काम चला लेते हैं। चलते चलते इतना ही कहूंगा उनके चाहने वालों की लम्‍बी कतार हैं।

चलते चलते। दिग्‍गी सिंह, सोनिया जी आप नाराज क्‍यूं हो रही हैं, हमने तो राहुल के कहने पर सब बयान दिए थे, सोनिया, दिग्‍गी जी आपकी उम्र हो चली है, राहुल तो अभी बच्‍चा है, आपको तो कुछ सोचना चाहिए था।

आपका
कुलवंत हैप्‍पी  

हिन्‍दी चिट्ठाकारिता के विकास के मार्ग में बाधक आत्‍ममुग्‍धता की दूषित प्रवृत्ति


कबूतर चिट्ठियों से तंग हुए या नहीं, इस बारे में शोध किया जाना जरूरी है लेकिन संदेशवाहक चिट्ठियों की करतूत के कारण खूब भूत बने हैं, यह अतीत बतला रहा है। चिट्ठी ने तंग भी किया और जो तंग थे, उनको राहत भी खूब प्रदान की। चिट्ठियां न लिखना जानने वाले अपनी प्रेमिकाओं और प्रेमियों के लिए चिट्ठी लेखकों की तलाश में जुटे रहते थे और तब क्‍योंकि किसी कार्य के बदले में धन नहीं, अन्‍न मिला करता था या जीवन में उपयोग की जाने वाली जरूरी वस्‍तुएं, जिनसे जीवन यापन में सहजता होती थी, इसलिए उन्‍हें भी कभी एक चिट्ठी लिखने के बदले 10 गन्‍ने, दो सेर गेहूं, दो सीताफल अथवा ऐसी ही कोई चीज दे दी जाती थी और चिट्ठी लेखन के मेहनताने को अपने सिर पर उठाए, गर्वीली अनुभूति प्राप्‍त करता हुआ लेखक यह जा और वह जा।
घर जाकर इस उधेड़ बुन में जुट जाता था कि अगली बार लिखी जाने वाले चिट्ठी में और कौन से रोचक मसालों का उपयोग किया जाए ताकि सीताफल के स्‍थान पर 5 किलो दशहरी आम अथवा 3 तरबूज अथवा 7 खरबूजों का पारिश्रमिक मिल जाए। खैर ... यह तो तब की बात है लेकिन अब की बात बिल्‍कुल अलग है। बाद में जब मुद्रा का चलन शुरू हुआ तो बदले में आने, दो आने, चार आने और आठ आने तक मिलने लगे परंतु सोलह आने वाला मामला तब तक जमा नहीं था। मामला सोलह आने तक पहुंचा भी नहीं और सीधे 5 रुपये, 10 रुपये और 50 रुपये प्रति पत्र तक छलांग लगाकर पहुंच गया है।
चिट्ठी लेखकों के लिए यह स्‍वर्णयुग था लेकिन बाद में चिट्ठियों की काफी दुर्गति हुई। अखबारों, पत्र पत्रिकाओं में चिट्ठियां छापी तो जाने लगीं लेकिन उनके मेहनताने के बारे में तो कौन कहे, वह प्रति भी लेखक को खुद ही खरीदनी पड़ती थी। अब भी वही हाल है। चिट्ठी लेखकों को इस समस्‍या से निजात मिली, जब इंटरनेट का माया जाल पूरे विश्‍व में छा गया। चिट्ठी लेखकों ने चिट्ठी लिखना छोड़कर, चिट्ठे बना लिए और उस पर चिट्ठी नहीं, लेकिन चिट्ठीनुमा (5 या 10 चिट्ठियों के बराबर एक) पोस्‍ट लगाकर खूब वाह वाही लूटनी शुरू कर दी। बिना यह जाने भी इस प्रकार की आत्‍ममुग्‍धता के कारण उन्‍होंने अपने खर्चे बढ़ा लिए। जो अपनी टिप्‍पणी में सच कह देते थे, उनकी टिप्‍पणी को चिट्ठाकार मिटा दिया करते थे क्‍योंकि किसी को भी अपनी तारीफ तो भली लगती है लेकिन आलोचना जहर लगती है और जहर कोई पीना चाहता नहीं है। जबकि आलोचना से सीखकर ही रचना प्रक्रिया में निखार लाया जा सकता है लेकिन इन आत्‍ममुग्‍ध चिट्ठाकारों को कौन समझाए, जो अभी अभी नए नए लेखक बने हैं और छपने और पुरस्‍कार पाने को अपना हक मान बैठे हैं।
उस पर तुर्रा यह है कि महिला चिट्ठाकार अगर एक पंक्ति भी लिख दें तो वाह वाही करने वालों की इतनी लंबी कतार लग जाती है। मानो फ्री में नौकरी मिल रही हो या राशन बंट रहा हो। अब इस वाह वाही के पीछे पुरुष का कौन सा लालच सक्रिय है, इसे तो सब जानते हैं परंतु मानते-स्‍वीकारते नहीं हैं। इन्‍हें कुछ समझाने की कोशिश भी की जाए तो काले कौए की तरह कोयल झपट पड़ती हैं और समझावनलाल का सिर अपनी चोंच मार मार कर लाल कर देती हैं। इसमें उनके साथ खूब सारे कौए भी होते हैं। इस प्रवृति का कोई हल भी फिलहाल नहीं निकल पाया है।
बात चल रही थी चिट्ठी के चिट्ठे बनने के सफर की। वैसे इसमें सीखने वालों की कमी भी नहीं है। वे सचमुच में सीखना चाहते हैं। किसी पुरस्‍कार के लिए जोड़ तोड़ भी नहीं करते हैं। उन्‍हें मालूम है कि जब उनके लेखन में ताकत आ जाएगी, तब उन्‍हें किसी के पास पुरस्‍कार पाने के लिए गिड़गिड़ाने की जरूरत नहीं रहेगी। जिस प्रकार समाज में अच्‍छाईयां और बुराईयां दोनों मौजूद हैं और अच्‍छाई की मात्रा कम तथा बुराई की मात्रा अधिक है, तो ऐसा होना तो नियति है। इससे बचना संभव नहीं है।
चिट्ठालेखन में आ रही इस दूषित प्रवृति ने इस नए चिट्ठा माध्‍यम का बहुत नुकसान किया है और इस नुकसान को लेकर शोर मचाने वाले भी वही हैं, जो इसके लिए जिम्‍मेदार हैं। फिर भी मेरा मानना है कि किसी भी माध्‍यम के आरंभ में इस प्रकार की बाधाएं तो आती ही हैं, आती भी रहेंगी और इन्‍हीं से नए नए रास्‍ते मिलेंगे, सोपान बनेंगे और यह माध्‍यम शिखर की ओर प्रवाहमान होगा।
आज इतना ही आप सबकी प्रतिक्रियाओं के लिए। इस पर आगामी पोस्‍ट प्राप्‍त प्रतिक्रियाओं के आईने में लिखी जाएगी। 

बिहार से लौटकर; बदल रहा है बिहार

जब बिहार अपने 100 वर्ष पूरे कर रहा था, उन्‍हीं दिनों हमारा कंपनी के काम को लेकर बिहार जाना हुआ है, बिहार को लेकर कई प्रकार की धारणाएं समाज फैली हुई हैं, जैसे कि यह लोग मजदूरी के लायक हैं, यह लोग बेहद गरीब हैं, बिहार में गुंडागर्दी एवं लूटमार बहुत होती हैं, यह लोग विनम्र नहीं, पता नहीं क्‍या क्‍या, मगर जैसे ही असनसोल एक्‍सप्रेस ने बिहार में एंट्री मारी, वैसे ही मेरी निगाह हरे भरे खेतों की तरफ गई, जहां किसान काम कर रहे थे, कुछ लोग भैंसों खाली स्‍थानों पर चरा रहे थे, कुछ कुछ किलोमीटर पर पानी के चश्‍मे थे, जो किसी भी राज्‍य के लिए गर्व की बात होती है, मैं यह सब देखते हुए रेलगाड़ी के साथ आगे बढ़ रहा था, खुशी थी कि कंपनी के काम के कारण ही बिहार की एक झलक देखने को तो मिली, बिहार के उपरोक्‍त दृश्‍य मुझे अनिल पुस्‍दकर के ब्‍लॉग अमीर देश गरीब लोग की याद दिला रहे थे कि इनका राज्‍य कितना अमीर है, यह कोई नहीं जानता, बस अगर कोई जानता है तो इतना के बिहारी दूसरे राज्‍यों में जाकर कार्य करते हैं।

जैसे ही पटना पहुंचा तो सबसे पहले वहां की स्‍िथति को जानने के लिए मैंने वहां बिक रहा अखबार खरीदा, जिसको इंटरनेट पर कई दफा देखा, मगर हकीकत में पहली बार देखा, इसका लेटआउट बेहद प्‍यारा था, और यह अंक वाक्‍य में बेहतरीन था, इसी अंक ने मुझे यह बतलाया कि आज बिहार सौ साल का हो गया एवं इस अंक के अंदर बुजुर्ग एवं युवा के विचारों का सुमेल अंकित किया गया था, जिससे यह पता चल सके कि बिहार ने असल में तरक्‍की की या नहीं, युवा पीढ़ी के विचार देखकर लगा कि बिहार तरक्‍की के राह पर अग्रसर है, और यहां की स्‍िथति दिन प्रति दिन बदल रही है, लोगों में जागरूकता आ रही है।

इतने में मेरे सामने बैठे एक नौजवान ने हम से बात करने में रुचि दिखाई, इसने बिहार के अंदर हो रहे परिवर्तनों से अवगत करवाया, सबसे बेहतरीन बात तो यह थी कि वह युवक अपनी मीडिया की अच्‍छी खासी जॉब छोड़कर अपने राज्‍य लौट चुका था, क्‍योंकि वह नहीं चाहता था कि बिहारियों को भी अब पहले की तरह आंका जाए, यह बात वह अकेला ही नहीं, बल्‍कि बिहार का हर पढ़ा लिखा युवक सोच रहा है, पिछले कुछ सालों से बिहार के निवासियों ने अन्‍य राज्‍यों की तरफ जाने का रुझान कम कर दिया, जो बिहार के अंदर हो रहे विकास की पहली निशानी कही जा सकती है, इतना ही नहीं युवक ने बताया कि बिहारी मजदूर कितने माह बाहर रहते हैं, ज्‍यादा से ज्‍यादा तीन माह, उसके बाद वह अपने राज्‍य को लौटते हैं, खाली हाथ नहीं बल्‍िक एक अच्‍छे धन के साथ, जिसका वह अपनी कृषि में निवेश करते हैं, जो कि एक बेहतरीन निवेश है।

वो युवक तो बगुसराय उतर गया, लेकिन उसकी जगह कुछ और युवक आकर बैठ गए, जो सुखवल जा रहे थे, सुखवल नेपाल के समीप स्‍थित है एवं कहते हैं कि यहां के हर घर में हथियार हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह लोग हिंसक प्रवृति के ही हैं, बल्‍कि यह हथियार, तब निकलते हैं, जब बात इज्‍जत पर आ जाए, वो तो देश के हर कोने में होता है, उस युवक ने बताया कि मुंगेर के अंदर हर प्रकार के हथियार बनते हैं, नई नई तकनीकों के हथियार, जो शायद नक्‍सलियों को भी सप्‍लाई होते होंगे, मगर सहरसा आने से पहले पहले उस युवक के मुंह से यह तो निकल गया कि अब बिहार में बीस फीसदी गुंडे बचे हैं, बाकी सब अंडरग्राउंड या जेलों में बंद हैं। वह युवक आईसीआई बैंक में जॉब के लिए इंटरव्‍यू देकर सुखवल लौट रहा था, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि वहां के लोग भी सुखद एवं भय रहित जीवन जीने के इच्‍छुक हैं।

सहरसा पहुंचने के बाद जब हम उन लोगों से मिले, जिनसे मिलना था, तो मिलकर बिल्‍कुल नहीं लगा कि बिहार के अंतिम स्‍टेशन पर हम पहुंच चुके हैं। उनका मिलनसार व्‍यवहार ही कुछ ऐसा था, अगले दिन सुबह कचहरी में कंपनी के काम से जाना हुआ, जब हम कचहरी पहुंचे तो वहां एक परिंदा तक नहीं था, लेकिन जब बाद दोपहर लौट रहे थे तो पैर रखने की जगह तक नहीं थी।

जब बिहार से सूरत पहुंच तो यह घटनाक्रम हमने जेबीएम परिवार के एमडी अशोक मंगुकिया के साथ शेयर किया, तो उन्‍होंने कहा कि जैसा नेता वैसी प्रजा, आज बिहार की सत्‍ता एक पढ़े लिखे एवं सुलझे हुए इंसान के हाथों में है, तो स्‍वभाविक है कि वहां की जनता में परिवर्तन आएगा।

चोर के दाढ़ी में तिनका उर्फ चोर चोर मौसेरे भाई उर्फ चोर बोले जोर से....


अरूण साथी-(व्यंग्य)
बचपन से ही मास्टर जी समझाते रहें चोर की दाढ़ी में तिनका तथा चोर चोर मौसेरे भाई का अर्थ पर इ खोपड़िया में आज तक नहीं घुसा और आज अचानक जब दिल्ली के संसद भवन का लाइव शो देखा तो बात समझ में आ गई। 
     गांव में एक किस्सा है कि काजी साहब के अदालत में मुकदमा आया चोर को पकड़ने का और कई लोग थे, काजी साहब ने तुक्का मारा जिसके दाढ़ी में तिनका होगा वही चोर, असली चोर ने तुरंत अपनी दाढ़ी साफ करनी चाही और धरा गया..। यहां किसको धरियेगा सब अपनी अपनी दाढ़ी साफ करने में लग गए..। जय हो जय हो।
    एक किस्सा और, एक बार गांव के बड़का जमींदार के बेटा मेरे मुर्गीखाने से मुर्गी चुरा कर भाग रहा था। मैंने देख लिया, आवाज लगाई, पर वह रूका नहीं। मैं भी कहां रूकने वाला था। रूकता भी काहे। बड़े लाड़ प्यार से पाला था उसे, भविष्य के सपने भी संजोए थे। बड़का बड़का सपना, मुर्गी के सहारे। एक मुर्गी कई अंडे, अंडों से चूजा, चूजों से फिर मुर्गी और फिर उसे बेच कर बेटे का नाम स्कूल में लिखवानी थी। बेटा पढ़ लिखकर कर चपरासी बनता और घर मे दो सांझ चुल्हा जलता, पेट में दो जून रोटी जाती और अपना जिनगी भी चैन से कटता। पर उसी को चुरा लिया, जमींदार साहब के बेटा मंुगेरना। अब गांव में मुंगेरना का धाक भी बड़का भारी था। जमींदारी भले ही चली गई पर ये लोग आज भी जमींदार ही थे। कौन हिम्मत करता इनके खिलाफ बोलने की। हिम्मत तो रामू काका ने किया था जब उसकी बेटी को... पर हुआ क्या? बेचारे जेल में सड़ रहे है। कहते है जमींदार साहब कि अब लोकशाही में जमींदारों को लठैत रखने की जरूरत का है, इ थाना पुलिस काहे है। पैसा फेंको तमाशा देखो।।।
पर मैं क्या करता, सपनो की चोरी हुई और वह भी आंखों के सामने, सो दौड़ पड़ा पीछे पीछे। मेरी भी बुद्धि कुछ भ्रष्ट मानते है गांव बाले। कहते है कि पगला गया है बगलुआ। बुरबक, लोकतंत्र, संविधान, मानवाधिकार जनलोकपाल और भ्रष्टाचार की बात करता है। कभी कभी कुछ समझाते भी थे, किताब में लिखल बात, घोड़ा के पाद....। पर कहां समझ आता था। सो दौड़ते हुए पहुंच गए बाबू साहेब के दरबाजा पर। बड़का बाबू साहब सामने मिले। ‘‘क्या बात है?’’ मैंने कहा- ‘‘आपके बेटे ने मेरी मुर्गी चुरा ली उसी के सहारे मैं सपना देखा था परिवार के पेट में दो जून रोटी की....।’’ ‘‘अरे, जमींदार का बेटा मुर्गी चुराएगा? पगला गया है का? बेटे को बुलाया, अरे मंुगेरना...। पूछा, तूने मुर्गी चुराई, उसने कहा-‘‘नहीं बाबू जी! मैं ऐसा क्यूं करूगा!’’ बगल में नौकर पगला खड़ा था-बोल दिया, ‘‘क्या बाबू जी आपके हाथ में खून तो लगा है और आप इंकार कर रहे है, देखिए इसे ही कहते है चोर के दाढ़ी में तिनका।’’ पर वह तो पागल था उसकी बात का क्या? और फिर क्या था, सभी लोग हो हल्ला करने लगे, साला जमींदार का बेटा मुर्गी चुराएगा। हो हो हो हो हो....। चोर चोर मौसेरे भाई। और चोर बोले जोर से। कई मुहावरों का अर्थ उस दिन मैं समझ गया था। 
बड़का साहब अपने लोगों से बोल रहे थे-‘‘यह हिम्मत कि दो जून की रोटी के सपने देखे, साला, फिर हमलोगों के घर मजूरी कौन करेगा? इसलिए तो बेटा ने बुद्धि का काम किया, न रहेगी मुर्गी न रहेगा सपना।’’ 
और आज।
संसद भवन का नजारा देख इन मुहावरों का अर्थ फिर से समझ गया। बेचारे सिसौदिया ने तो महज एक मुहावरा सुनाया था और वे भड़क गए। जैसे चोर को चोर कहो तो भड़कते है। भड़के भी ऐसे कि सभी के दाढ़ी का तिनका तिनका नजर आ गया और मौसेरे भाई की तरह जोर जोर से बोलने लगे। लोहीया और जेपी के समाजवाद की रंथी को कांधें पर उठाए बेचारे कठोर सिंह यादव को तो सबसे ज्यादा गुस्सा आया संसद मे हाजीर करो.....भाई बेटा जब विरासत का राजा बन जाए तो बाप निश्चिंत हो ही जाता है सो दिल्ली की राजनीति में दिल्लगी करने लगे। और जॉर्ज साहब को वाणसैय्या पर लिटा चारणी के सहारे मुखौटा अध्यक्ष बनने वाले हमारे शीतल यादव को तो और अधिक गुस्सा आ गया। भला बताओं, चोर, डकैत, मर्डरर यह सब कहने का सर्वाधिकार तो हमारे पास सुरक्षित था उसे कोई अपनी संपत्ति बताएगा? अजी यह सब तो नेताओं ने अपने नाम पेंटेंट करा रखा है। 
चलो जो भी हुआ पर अब बच्चो को समझाने में दिक्कत नहीं होती, जैसे कि मुहावरो का अर्थ जब बनाने के लिए गोलू को दिया तो उसने यूं बनाया।
चोर की दाढ़ी में तिनका-सिसोदिया के बयान पर भड़के नेताओं ने यह बता दिया कि चोर की दाढ़ी में तिनका होता है।
चोर चोर मौसेरे भाई-अन्ना टीम पर निंदा प्रस्ताव और जनलोकपाल के मुददे पर नेताओं का साथ साथा आना।
चोर बोले जोर से- संसद में नेताओं का जनलोकपाल पर भाषण देना। जय हो जय हो, अन्त में नेताओं ने कह भी दिया कि जब जनता ही हमे चुनती है तो 
वह भी चोर है... 
हम भी चोर तुम भी चोर
अभी नहीं आएगा भोर
करते रहेगें यूं ही शोर
अन्ना लगालो जितना जोर
वन मे बस नाचेगा मोर
पैरों पर कौन करेगा गौर
यह तो है पूंजीवादियों का दौर
गांधिवादियों को कहां मिलेगा ठौर
जय हो जय हो जय हो..

संसद,केजरीवाल ,याराना और महादेवी वर्मा !

आज यहाँ पर अलग तरह की चर्चा करने का मन है.बात यह है कि मन बड़ा उद्विग्न है देश की ताज़ा राजनीति के चलते .देश में जो कुछ भी चल रहा है,निश्चित ही अच्छे संकेत नहीं हैं.भ्रष्टाचार और अपराध अपने चरम  पर हैं पर हमारे प्रतिनिधि मुद्दों को उठाने में भी धौंस दे रहे हैं.देश की ढेर सारी  संपत्ति बाहर पड़ी है,अंदर लूट मची है,ईमानदार आदमी सत्ता और माफिया के निशाने पर हैं.ऐसे में आम आदमी क्या करे ? इसी उधेड़बुन में मैंने फेसबुक में एक स्टेटस डाला है उसे यहाँ भी साझा कर रहा हूँ !


'अगर आप जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं तो आपको संसद या विधानसभाओं के अंदर गाली-गलौज करना ,कुर्सी-माइक फेंकना ,दस्तावेज या बिल फाड़ना ,अश्लील फिल्म देखना ,सवाल पूछने और समर्थन के बदले पैसे वसूलने का अधिकार है,मगर यदि आप जनता हैं और इन सब बातों को लेकर शिकायत करते हैं तो आप अमर्यादित और असभ्य तो हैं ही देश-द्रोही भी हो सकते हैं !
संसद के अंदर और बाहर लूटमार जारी रहे और लुटने वाले को कहने का भी हक नहीं,यही सत्य है क्या ?'


अन्य भाई क्या सोचते हैं,देखिये :

Arvind Kejriwal's response to allegation that he has demeaned the parliamentarians. (Part8)







हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग संसार में कल 25 मार्च 2012 को एक हिंदी ब्‍लॉगर की पोस्‍ट पर की गई टिप्‍पणी में शोले से प्रख्‍यात 'याराना' शब्‍द का प्रयोग किया गया। संदर्भ बतलाएं और 'याराना' शब्‍द का आज एक दमदार हिंदी ब्‍लॉगर ने पुन: किसी अन्‍य संदर्भ में प्रयोग किया। पीडि़त, प्रभावित ब्‍लॉगरों के अतिरिक्‍त जो इस संबंध में प्रामाणिक जानकारी देंगे, उन्‍हें नकद 101/- रुपये का चैक पुरस्‍कार स्‍वरूप, नई दिल्‍ली में एक समारोह में प्रदान किया जाएगा।

कर्म करें और भाग्‍य आजमाएं न कि किसी सेलीब्रिटी की तरह फोटो से उगाही करने के सपने सजाएं।






आज महादेवी वर्मा जी का जन्मदिन है , एम् ऐ में मेरे पास छायावाद का विशेष पेपर था , प्रसाद मेरे प्रिय रचनाकार हैं , इसके बावजूद महादेवी जी की अनके कविताओं को मैंने संवेदना के धरातल पर जिया है , उस उम्र में वैसे भी रोमानियत का एक नशा होता है मेरा सौभाग्य है की मुझे महादेवी जी से साक्षात् मिलने का अवसर मिला , उनके साथ का प्रस्तुत चित्र मेरी, साहित्यिक धरोहर है — withपूर्णिमा वर्मन and 9 others.









यह मीडिया तोड़ती मरोड़ती कैसे हे जी उर्फ मैंने ऐसा तो नहीं कहा था...


अरूण साथी (व्यंग्य)

जब-तब, जहां-तहां मीडिया में बयान देने के बाद जब गर्दन फंसती है तो टका सा जबाब होता है मीडिया ने तोड़ मरोड़ कर बयान को पेश कर दिया, मैंने ऐसा तो नहीं कहा था। अब कस्बे के मोहनजी चाय दुकान पर भी चुस्कीया संसद में इसी मुददे पर गर्मा गरम बहस हो रही थी। बहस में भाग लेते हुए मैने भी कुछ फेंक दिया-भैया अब जब श्रीश्री ने यह आरोप लगा दिया है कि मीडिया ने उनके बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया तो यह बात पक्की हो गई कि मीडिया, बयान को तोड़ मरोड़ देती है। हलंाकि इससे पहले मैडम, युवराज से लेकर मंत्री संत्री और धनवन्त्री तक आरोप लगा रहे थे पर कोई भरोसा ही नहीं कर रहा था! मैं तो तभी से कहूं कि यह मीडिया होती ही है बड़ी चालांक, जिस तिस के मंुह से जो सो बयान घुंसेड़ देती है और फिर रपेट रपेट कर कहने वालों को ही रपेट देती है। फिर क्या था, बेतर्क के तर्क निकलने लगी और संसद की ही तरह हो हल्ला, बेमतलक का। वह तो शुक्र है कि मैं ने तीसरी कप चाय का ऑर्डर दे दिया वरना यहां से भगाने का दुकानदार ने पूरा मन बना लिया था। 

खैर, शर्मा जी ने भी चुस्की के साथ चुप्पी तोड़ी, भैया ई बुद्धू बक्सा बाला सब बुद्धूये बनाते रहता है, सतयुग में सरसत्ती माय कैकेयी के जिह्वा पर बैठके राम को बनवास दिला दी थी और इस भठयुग में मीडिया बाला ही सरसत्ती माय बन जिह्वा पर बैठ के अंट शंट बोलवा देता है।

अब पंडित जी भी कहां चुप रहने वाले थे, सो उन्होने भी लंबा छोड़ा- अजी मैं तो कहूं ई नाराद मुनी के जात वाला पर भरोसा नहीं करे का है। इ हम सब को बुद्धिये बनाते रहता है?

अब दूध बेचने आए जादव जी से भी नहीं रहा गया, बोल दिये- तभिए तो भैया, हमर जात गोतिया के नेता सब संसद में कह रहे थे कि ई बुद्धू बक्सा को बंद होना चाहिए...। ई अन्ना नीयर आदमी के भी तोड़-मरोड़ मंत्र से ही ऐतना बड़का गो बना दिया है। सोंचना पड़ेगा भैया।

तभी पुराने कंग्रेसिया और उजर झकझक कुर्ता पहन थाना-ब्लॉक के दलाली करने वाले युगल बाबू को भी ताव आ गया, बोले-अजी हमरे पार्टी वाला नेता सब कबे से चिल्ला रहे है कि मीडिया पर लगाम लगाओ पर कोई रस्सीये नहीं देता है। तभिये तो दिग्गी बाबू को बिलेन बना दिया, अजी उनके मुंह से जो भी निकलता है सब मीडिया मंत्र से तोड़ल मरोड़ल रहता है। समझे की नहीं?
अब मैंने भी अपना अज्ञान अलाप दिया- 
जय हो, जय हो, बुद्धू बक्सा तो बेकार में बदनाम है।
इसको बुद्धू बनाना सबसे आसान काम है।
बस तोड़ने मरोड़ने का लगाना इल्जाम है।
और चौथेखंभे का काम तमाम है।।
जय हो...।

सरकारी स्कूलों में नक्सली पैदा होते तो श्रीश्री का ऐश्वर्य कहां से आता....


श्रीश्री रविशंकर ने जयपुर के एक समारोह में कहा कि सरकारी स्कूल नक्सली और हिंसा की फैक्ट्री है। वास्तव में (अब मैं श्रीश्री आगे नहीं लगाना चाहता) रविशंकर ने जिस भाषा का प्रयोग किया है वह उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जिसे पुंजीवाद कहा जाता है। ऐश्वर्यशाली जीवन हो तो सपने भी ऐश्वर्यशाली हो जातें है और इसी का परिचायक है रविशंकर का यह बयान। जिस सरकारी स्कूल को रविशंकर ने नक्सलवाद और हिंसा की फैक्ट्री कहा है यदि वे स्कूल नहीं होते तो सच में पुंजीवाद को आज पुंजीवाद भी कहने वाला कोई नहीं होता। उन्हीं सरकारी स्कूलों में हमारे जैसे करोड़ लोग पढ़े है और देश और समाज में सरकारी स्कूल का प्रतिनिधित्व कर रहें है। सरकारी स्कूलों की तुलना यदि हम निजि स्कूलों से करें भी तो यह हास्यास्पद हो जाता है। दरअसल यह मैकाले की शिक्षा का भी पोषक है। जिस शिक्षा के तहत हमें नौकर बनाने की फैक्ट्री में झोंक दिया जाता है और वहां से निकल कर हम संवेदनहीन बनकर महज एक मशीन बन जाते है रविशंकर भी उसी के पैरोकार बन कर सामने आए है। जब भी मैं इस तरह के किसी भी बाबा या कथित साधू को देखता हूं तो कभी मेरे मन में उनके प्रति श्रद्धा नहीं उत्पन्न होती और उसका मूल कारण कबीर दास के इस  कथन से समझा जा सकता है।
"बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ । 
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥ "
 रही बात नक्सलवाद और हिंसा की, तो यह एक अलग से तर्क का व्यापक विषय है। मेरे विचार से नक्सलवाद और हिंसा एक व्यापक फलक है जिसे समझ कर ही इसे मिटाया जा सकता है। हलंाकि ओशो ने गांधी जी के अहिंसा के सिद्वांत को इस आधार पर खारिज कर दिया है कि जिस अहिंसा में अपने साथ हिंसा की जाती तो वह अहिंसा कैसा? रही बात नक्सलवाद तो यह एक आंदोलन था जो रास्ते से भटक गया है और यदि सरकारी स्कूलों मंे नक्सली पैदा होते तो देश पर आज उनका ही राज होता। 
 कम से कम इतनी बुराईयों के बाद भी मैं मानता हूं कि नक्सलवाद आज भी अपने ही व्यवस्था की वजह से पनप रही है। मुझे आज भी याद है लाल सलाम फिल्म का वह डायलॉग जिसमें एक नक्सली कहता है कि जब कोई आपके मुंह में मूत दे तो क्या करेगे?
 यही सवाल सबसे बड़ा है। नक्सलवाद को यदि कुछ आपराधिक गिरोहों से अलग कर दिया जाए तो यह आज भी अपने बिमार समाज का एक लक्षण मात्र है और बिमारी को ठीक करने की जगह हम मरीज को ही मारने की बात करते है?
 जो भी हो पर रविशंकर का यह बयान आदमी के भगवान होने की अभिप्सा से उपजे अहंकार का भी परिचायक है।

अकेलापन,तोताराम और लम्बरदार !

दोस्तों नमस्कार !
आज हाज़िर हुआ हूँ लेकर नया समाचार !
आप को न पढ़ाना है ना समझाना है
बस्स..इसी बहाने आपसे बतियाना है.

हमारी कोशिश रहेगी कि चुनिन्दा लिंक दिए जाएं,जो सारगर्भित और कुछ मिश्रित सामग्री के साथ हों.इस चर्चा में कुछ ब्लॉग से और कुछ फेसबुक से ,पहले की तरह !

कैलाश शर्मा का अकेलापन कितना काटता है या सीख देता है ?

अनुजी कितना कुछ छोड़ के कितना कुछ खो आई हैं ?

रमेश जोशी के तोताराम का किस्सा !


और अब कुछ हल्का-फुल्का हो जाये !

सीधे फेसबुक से....


सरकार द्वारा गरीबी रेखा का पैमाना नीचे करने से एक लतीफा याद आ रहा है।

एक बार एक जगह बाढ़ आ रही थी। कर्मचारी ने अफसर को सूचना दी - सर पानी खतरे के निशान के ऊपर बहने लगा है, क्या करें?

अफसर - करना क्या है, खतरे के निशान को और ऊँचा कर दो।

जब रेल ज्वाइन की थी तो भारी-भरकम डायल वाला फोन होता था। अब वीडियो कॉंफ्रेंसिंग। कहां से कहां आ गये!

हर माँ को अच्छे लगते हैं वो घर
जिनमे एक आँगनहो
अच्छी लगती हैं वे दीवारें
जिनपर हमारे तुतलाते हस्ताक्षर हों
मुझको अच्छी लगती है हर वह अनुभूति
जो अम्मा से जुडी है
क्यूंकि माँ एक शब्द भर नहीं
एक संवेदन संपूर्ण भाषा है
और अंत में...

मेरी और पदम सिंह की अचानक चैटिंग पर भेंट !

मैं: लम्बरदार..जय हो..
Padm: pranaam sweekaaren mahraaj
कैसे हैं आप
मैं: जुग-जुग जियो...!सरकार का खून पियो !
Padm: हा हा हा
मैं: इसे स्टेट्स पर लगा दें
Padm: मालिक हैं आप
मैं: अब आपकी संपत्ति है
Padm: मगर हम हमेशा आपके मार्गदर्शन मे ही चले हैं
इस लिए "महाजनो ये न गतह स पंथाह"

मैं: तभी तो भले हैं...हा हा हा !
 

हैप्‍पी अभिनंदन में स्‍पंदन वाली शिखा जी

नमस्‍कार दोस्‍तो, मैं कुलवंत हैप्‍पी, एक लम्‍बे समय बाद आपके समक्ष हमारे बीच में से ही एक शख्‍िसयत को हैप्‍पी अभिनंदन के जरिए आपसे मिलवाने लाया हूं, वैसे तो यकीनन आप उनकी रचनाओं एवं उनके ब्‍लॉगों के मार्फत उनसे कई बार मिल चुके होंगे, लेकिन हैप्‍पी अभिनंदन में आज उनसे मिलकर देखिए, और बताइए कि इस बार मिलने में और पहले मिलने में क्‍या अंतर लगा, जो शख्‍िसयत आज हैप्‍पी अभिनंदन में मेरे सवालों के जवाब में अपने विचार रखने जा रही है, वह कोई और नहीं बल्‍कि ब्‍लॉग स्पंदन/अंतर मन में उठती हुई भावनाओं की तरंगें पर लिखने वाली शिखा वार्ष्‍णेय जी हैं, जो रहती लंडन में हैं, लेकिन लिखती हिन्‍दी में हैं, और उनकी स्‍मृतियों में बसता है रूस, जहां से उन्‍होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की एवं  चैनल में न्‍यूज प्रड़यूसर रह चुकी हैं शिखा जी अब स्‍पंदन पर लिखकर अपने अंदर की पत्रकार आत्मा तृप्त कर रही हैं।

हैप्‍पी के सवाल, शिखा के जवाब

शिखाजी, आपने पत्रकारिता की पढ़ाई की, लेकिन परिवारिक जिम्‍मेदारियों को पहल देते हुए आपने उससे नाता तोड़ लिया, लेकिन फिर अचानक आपको ब्‍लॉग जगत मिल गया, यहां पर आकर आप कैसे अनुभव करती हैं?

देखिये जगह कोई भी हो, हर तरह के अनुभव होते हैं कड़वे भी और अच्छे भी। हर तरह के लोग हर जगह होते हैं। अत: मेरे अनुभव भी मिले जुले ही हैं किंतु मेरा मानना है कि यदि ईमानदारी से अपना काम किया जाए कोई समस्या नहीं होती। मुझे ब्लॉग के रूप में अभिव्यक्ति का एक माध्यम मिला जिसका मैंने ईमानदारी से उपयोग किया है और मुझे अच्छा लगता है।

शिखा जी, व्‍यक्‍ित किसी न किसी से प्रेरित होता हैं, और आपके ब्‍लॉग पर आपके पिताजी के बारे लिखा संस्मरण पढ़ने के बाद लगा कि आप उनसे बेहद प्रभावित हैं, क्‍या कभी जिन्‍दगी में ऐसा हुआ कि आप मुश्‍िकल घड़ी में हैं, और पिता जी की किसी बात ने आपको हौंसला देते हुए मुश्‍िकल से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया हो, अगर हां, हमारे साथ सांझा करें उस पल को।

जी बिलकुल सही समझा आपने। मैं अपने पिता से प्रभावित हूँ या नहीं ये तो पता नहीं।मेरे यह मानना है कि मैं किसी से भी प्रभावित मुश्किल से ही होती हूँ। पर हाँ उनसे गहरा जुड़ाव अवश्य है. और ऐसे कई मौके आए जब मैंने अपने आपको बेहद मजबूर पाया, और उस वक्‍त पिताजी के स्मरण ही मेरी ढाल बने और स्वत: ही मुझमें हालातों से लड़ने की सामर्थ्य आ जाती है. ऐसे कई पलों का मैंने अपनी ब्लॉग पोस्ट में उल्लेख किया है।

शिखा जी, आपने पत्रकारिता में मास्‍टर डिग्री हासिल की एवं कुछ समय तक मीडिया में कार्य भी किया, और यकीनन इस बाबत आपके पास एक अच्‍छा अनुभव भी होगा, तो मैं जानना चाहता हूं कि भारतीय एवं ब्रिटिश मीडिया में आपको सबसे बड़ा अंतर क्‍या लगता है?

सामान्यत: जो अंतर बाकी क्षेत्रों में है वही मीडिया में भी है.यहाँ ब्रिटेन में कानून सबके लिए एक है फिर चाहे वह प्रधान मंत्री हो या एक आम नागरिक. हमारे यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  के नाम पर कुछ भी कहा – लिखा जाता है.या कुछ प्रभुत्व वाले लोग कुछ भी करें उनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाता. वहीँ ब्रिटेन में आप डेली मिर्रेर के मर्डोक का केस लीजिए इतने प्रभुत्व वाले पत्रकार को माफी मांगनी पड़ी, संसद में उस पर चर्चा हुई और प्रधानमंत्री तक को उसपर जबाब देना पड़ा.


शिखा जी, मैंने आपके प्रोफाइल में देखा है कि आपको हिन्‍दी के अलावा अंग्रेजी एवं रूस भाषा का भी ज्ञान है, अगर आपको रूसी भाषा का ज्ञान है तो यकीनन आप ने रूसी साहित्‍य को पढ़ा भी होगा, मगर मैं आप से यह जानना चाहता हूं कि आपको रूस का कौन लेखक बेहद पसंद है, और वहां साहित्‍य की कुछ खासियत जो उसको अन्‍य साहित्‍यों से अलग करती है ?


किसी भी देश का साहित्य उस भूमि से जुड़ा होता है उससे उस देश की संस्कृति की झलक हमें मिलती है. इसलिए सभी का अपना अलग स्थान है. रूसी लेखकों में मुझे चेखव बहुत पसंद हैं .उनकी छोटी छोटी कहानियों में रूसी शहरों और गांवों के जन जीवन की जीवंत तस्वीरें देखने को मिलती है और उनका विवरण बेहद रोचक होता है .वहीँ तोल्स्तोय का साहित्य उनकी सहज भाषा शैली की वजह से मुझे आकर्षित करता है.

शिखा जी, आपकी किताब स्‍मृतियों में रूस प्रकाशित हुई है, मैं जानना चाहता हूं कि क्‍या आप रूस में रह चुकी हैं, या फिर रूसी साहित्‍य पढ़ने के कारण रूस आपके जेहन में ऐसे बस गए, जैसे कि आप वहीं रहती है, मैं चाहूंगा कि आप रूस की कोई अभूल स्‍मृति हमारे साथ सांझी करें।

जी नहीं मेरी पुस्तक कल्पना पर आधारित नहीं बल्कि मेरे अपने अनुभवों पर है.जो मैंने अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई के छ: वर्षों के दौरान वहाँ पाए.मैंने मोस्को स्टेट यूनिवर्सिटी से टीवी पत्रकारिता में परास्नातक किया है. स्मृतियाँ बहुत हैं उसके लिए मेरे ब्लॉग या यह पुस्तक पढ़ें।

शिखा जी, आप लंडन में रहती हैं, ऐसे में पाठक एवं ब्‍लॉगर दोस्‍त जानना चाहेंगे कि आपकी किताब स्‍मृतियों में रूस भारत में भी उपलब्‍ध है या नहीं, अगर नहीं तो कब तक होगी, अगर है तो कोई कैसे प्राप्‍त करें?

जी हाँ स्मृतियों में रूस भारत में ही डायमंड पब्लिशर से प्रकाशित हुई है. अत: डायमंड बुक्स की साईट से या उनसे संपर्क करके वी पी पी से आप पुस्तक माँगा सकते हैं. वैसे शायद कुछ दुकानों में भी उपलब्ध हो परन्तु मुझे उसका अभी पता नहीं है।

जीत गया भारत, जीत गया प्रकाशक : जीते आप सब भारतवासी : चर्चा में शामिल होइए : छोड़ के मन की सभी उदासी

जीत गया है भारत आज
विराट ने किया है
विराट चमत्‍कार
कलम है या तलवार है, सब इसी का चमत्‍कार है

फेसबुक पर अन्‍नास्‍वामी ने कहा

जीत गया भारत
कह रहा अन्नास्वामी
नहीं कह रहा
दे रहा है लिख
भ से भारत
भ से भगवन
भ से भय नहीं
भरोसा जीतने का ?



अब प्रकाशक की चर्चा करें यहां

ज्‍योतिपर्व प्रकाशन की खुशी का पारावार नहीं है। आज उनके प्रकाशन श्रंखला की पुस्‍तक की समीक्षा के प्रकाशन से राष्‍ट्रीय दैनिक में समीक्षा प्रकाशन का आरंभ हुआ है और वे इस खुशी में आप सबको शरीक करना चाहते हैं। आप नि:शुल्‍क प्रति की प्राप्ति केलिए arunroy1974@gmail.com के लिए बधाई देते हुए ई मेल पर रिक्‍वेस्‍ट भेजें और फोन नंबर 09811721147 पर तुरंत फोन कीजिए।
इस पोस्‍ट को अपने अधिक से अधिक मित्रों को शेयर करके ज्‍योतिपर्व प्रकाशन के सुख में भागीदार बनें। देर मत कीजिए, कहीं पहले से आउट ऑफ स्‍टॉक पुस्‍तक सचमुच में ही आउट ऑफ स्‍टॉक हो जाए और आपको आगामी संस्‍करण के आने अथवा पुनमुर्द्रण की प्रतीक्षा करनी पड़े।



ट्विटर पर मांग कर डाली अन्‍नास्‍वामी ने फिर से


जीत गया भारत, बुलाओ सोनिया जी को, डांस करेंगी आईटीओ, इंडिया गेट - तबीयत ठीक नहीं है तो मन में ही लड्डू फोड़ें विजय के।


इतनी सारी जीत
फिर कर लो इन पोस्‍टों से भी मन भर के प्रीत

पूरी दिल्‍ली में दिल्‍ली गान से मच गया है हल्‍ला
दैनिक जागरण बोल रहा है चिल्‍ला चिल्‍ला चिल्‍ला

सुमित प्रताप सिंह गीतकार ( हिंदी चिट्ठाकार ने कायम कर दी मिसाल)

कोई शक तो नहीं
पढ़ लें दैनिक जागरण आज का
और इंतजार करें कल के दैनिक जागरण का
देखें चित्र, बन रहे हैं ब्‍लॉगर गीतकार के मित्र
गा रहे हैं मन से दिल्‍ली का गान
दिल्‍ली का बढ़ा रहा है विश्‍व में मान।

माया सिर्फ रेल की नहीं है
माया मुलायम में भी है
मुलायम की माया
काया सख्‍त है
पुत्र ने जीता उनके 
उत्‍तम प्रदेश का मजबूत तख्‍त है
सीएम सुन रहे हैं
गुंडागर्दी के विरोध में खूब सख्‍त है

संतोष त्रिवेदी लिखना चाह रहे थे
लिख गए कुछ

सदाबहार बौराए हुए !



और कार्टूनकार वाले चलाकर आ रहे हैं
लघुकथा लीगल पेपर
आप भी जानकारी ले लीजिए
वकील बुलाकर।

बाकी बातें तो हम कल करेंगे
आज तो जीत को सेलीब्रेट करेंगे। 

 
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