चीन तंबू में बंबू लगाए बैठा : दैनिक पंजाब केसरी 21 मई 2013 अंक में प्रकाशित


कुछ समय बाद आप इसे यू ट्यूब के इस लिंक पर व्‍यंग्‍यकार के कर्कश स्‍वर में सुन सकते हैं।

देश तोतामय हो गया है : जनवाणी 14 मई 2013 स्‍तंभ 'तीखी नजर' में प्रकाशित


एक सरबजीत के लिए इतने आंसू क्यों : अंकुर मिश्र "युगल"



देश का एक नागरिक शराब के नशे में देश की सीमा में घूमता है तो कोई दूसरा देश उसे अखिर क्या समझेगा ! कोई पाकिस्तानी , चीनी या नेपाली भारत के अन्दर घुसकर इस तरह से घुमते हुए पकड़ा गया तो क्या उसे भारत सरकार या कानून गिरफ्तार नहीं करेगा ? ऐसी ही दशा में जब भारत का कोई व्यक्ति पडोसी देश में जाता है तो उसका पकड़ा जाना स्वाभाविक है !
लेकिन पकडे जाने के वहां दी गयी यातनाये निंदनीय है उन्हें  इसकी जाँच करके उसे बरी करना चाहिए था !
इस बात के लिए पाकिस्तान हमेशा दोषी रहेगा और उसे इसे स्वीकार भी  चाहिए लेकिन अब देश में इतने आक्रोश का माहौल क्यों ? आखिर क्या जनता अब भी नहीं समझी की सर्कार उसकी नीतियाँ समझ चुकी है, मौन और बौन प्रधानमंत्री को पता चल चूका है "ये जनता है चल दिन हल्ला करेगी और उसके बाद शांत हो जाएगी" ! ऐसे में क्या लगता है की भारत सरकार  में इतनी हिम्मत है की पाकिस्तान से इस बात का जबाब मान सके ? या जबाब ले सके ?  जब इस देश में साडी अच्छी या बुरी बाते एक सामान हो चुकी है तो जनता को भी अपनी जिम्मेदारियां दिमाग से समझनी चाहिए !
देश में देश की रक्षा के लिए अन्दर बाहर और सीमा पर हजारो लोग मारे जाते है ! उन्हें और उनके परिवार को पता होता है की जहाँ वो है उनकी जान कभी भी जा सकती है लेकिन फिर भी उनमे जज्बा होता है जो एक साधारण मनुष्य से अलग बनाता है ! लेकिन उस व्यक्ति को मरने के बाद जो सुविधाए मिलती है उससे अच्चा तो यही है की उसे भी सरबजीत सिंह जैसी हरकते करनी चाहिए ! और सीमा पार में जाकर प्रतिदिन सुबह शाम घूमना चाहिए ! आखिर सरकारे उस व्यक्ति के मरने के बाद इतने मुआवजे देकर दर्शाना  क्या चाहती है ? या फिर यहाँ भी वोटबैंक की राजनीती ! इस मुआवजे की जरुरत उसे है जिसके पास खाने के पैसे नहीं है जिसके राते सड़क के किनारे गुजरती है ! इस नौकरी की जरुरत उसे है जिनके यहाँ दिन के चूल्हे जलने दूभर है ! इसकी जरुरत इस परिवार को बिल्कुल नहीं है ! मई मानता हूँ सरबजीत के साथ गलत हुआ इसका जिम्मेदार वह व्यक्ति खुद भी है !




मुझे तो खेद है कही कुछ दिनों बाद भारत सरकार  सरबजीत सिंह को भारत रत्न, पद्मभूषण या परमवीर चक्र देने की बात न करने लगे ! आखिर जनता , सरकार और पडोसी कब समझेगे ये तो नहीं पता लेकिन ये सरे इसके हल नहीं होते !

क्या सच में ऐसा देश है हमारा :अंकुर मिश्र 'युगल'

आखिर और कब तक सपनों की दुनिया में रहेंगा ?
अनेकता में एकता , शांति का प्रतीक, सर्वधर्म समभाव आदि जैसी खोखली कहावतो को और कब तक मानते रहेंगे ? देश के अन्दर कोई दूसरा देश घुसता चला आ रहा है और हम अब भी शांति के दूत है ?
देश में रोज बलात्कार पे बलकार होते चले जा रहे है और हम शांति के दूत है ? देश के अन्दर एक व्यक्ति यह बोल देता है की बलात्कार महिलाओ की साज  सज्जा के कारण हो रहे है उस बात को लेकर देश के अन्दर एक उबाल आ जाता है लेकिन देश की सीमओं के अन्दर  घुसकर कोई  मातृभूमि को हड़पता चला जा रहा है उसके लिए कोई नहीं बोलेगा ! जनता भी  शांत है, मिडिया भी शांत है और सरकार भी शांत है !
एक सरबजीत के लिए सारे अखबार और न्यूज चैनल भरे पड़े है लेकिन उन हजारो सरब्जीतो का क्या जिन्होंने अपनी जान गवांकर देश को सुरक्षित रखा है !
कहा  है वो नरेन्द्र मोदी जो पाकिस्तान पाकिस्तान के पीछे पड़े रहते है , क्या भारत को पाकिस्तान से ही खतरा है ! अब चीन भी आ रहा है अब आप कुछ नहीं कहेंगे ?
कहा है वो अरविन्द केजरीवाल जो आम आदमी की साख में देश को बचाने चले थे वाही आम आदमी आज खतरे में है, जल्दी ही चीन धीमे धीमे करपे दिल्ली भी आएगा क्या आप तब भी धरना कर रहे होगे !
और वो दीदी कहा है जो पश्चिम बंगाल की लड़ाई में लिए दो दिल्ली तक आ जाती है लेकिन अब तो देश खतरे में है आप भी कुछ नहीं कहेंगी ?



खैर इन सब से पूंछने का ज्यादा हक़ तो है भी नहीं !  ये सब तो फिर आरोप प्रत्यारोप शुरू कर देंगे !
प्रश्न तो सरकार से बनता है, आखिर सप्ता होते हुए भी सभी पुतले क्यों बने हुए है, क्या प्रधानमंत्री अब भी किसी जुगाड़ की फ़िराक में है या या फिर इंतज़ार कर रहे है की 2014 के चुनाव में इसे भी मुद्दा बना लेंगे !
ohhhhhhhhh फिर से गुस्ताखी प्रधानमंत्री कौन होते है उत्तर देने वाले उत्तर तो इटली की महारानी से पूंछना होगा ! इस समय पर इनके बारे में कुछ अच्छाइयां  भी सुनने में आ रही है "त्याग" की कहानिया !
अभी मै कुछ दिन पहले एक महाशय से मिला सरकार के कार्यकाल की बात चल रही थी , महाशय बोले "है किसी में इतनी हिम्मत जो भारतीय इतिहास का हिस्सा न बनना चाहता हो, प्रधानमंत्री पद का त्याग कोई साधारण आदमी नहीं कर सकता "! खैर मुझे बात में दम तो लगी 'त्याग' की बात तो मननी पड़ेगी लेकिन त्याग  पद का नहीं इटली का  जो इटली छोड़कर भारत में रह रहे है सच में मेरी हिम्मत तो नहीं है की मै अपने देश को छोड़ सकू !!
तो अब आप कुछ नहीं कहेगी चीन मामले में , कही ऐसा तो नहीं है इटली का मध्यस्थ बनकर भारत को भेजने का इरादा हो आपका चीन के हाथो ! ........................
समस्याये समस्याए बनी हुयी है सरकार और राजनैतिक दलो का काम है बस आरोप प्रत्यारोप ! अखिर क्या होगा  आम आदमी का आम आदमी को भी नहीं पता !
बस देखते रहो और जागते रहो !


मन रे गा मिले खूब पेमेंट, मन रे गा मिले अब कार्ड : दैनिक हरिभूमि 30 अप्रैल 2013 अंक में प्रकाशित


क्या सच में 'नमो ! नमो ! नमो ! ' हो सकता है ? :अंकुर मिश्र 'युगल'


नमो ! नमो ! नमो ! की गूंज ने जिस तरह से पूरे देश में तहलका मचा रखा है क्या वो सच में देश का उद्धार करने में सक्षम है ! नरेंद्र मोदी देश के लिए आज एक ऐसा नाम है जिसे प्रधानमंत्री बनाने के लिए लगभग सभी की मुहर लग चुकी है ! यहाँ सभी से मतलब उस अधिकतम प्रतिशतता से है जो इन्हें भारत के अगले प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें देखना चाहते है , प्रसंशको में देखे तो इनके विपक्ष के राजनेता भी इस सख्शियत में देश का अगला प्रधानमंत्री देख रहे है ! इन सबके पीछे है केवल एक कारण गुजरात का विकास ,
गुजरात में इन्होने 'रूरल' और 'अरबन' दोनों  क्षेत्रो को ध्यान में रखकर 'ररबन' विकास की जो नीव राखी उसकी सराहना केवल भारत में ही नहीं बल्कि पुरे विश्व में हुयी ! विश्व की बड़ी सभाओ में अपने विकास के कदम बताने के लिए बुलाये जा चुके नरेन्द्र मोदी क्या सच में देश के अगले प्रधानमंत्री हो सकते है ये भाजपा से लेकर सभी पार्टियों केसामने बड़ा प्रश्न है ! देखा जाये तो खुद नरेन्द्र मोदी ने अपनी इस मुहीम के लिए प्रचार प्रसार शुरू कर दिया है ! बाबा रामदेव से मिलना , भाजपा के बड़े नेताओ को बार बार गुजरात बुलाना , कई बार दिल्ली आना , बड़ी सभाओ के राजनैतिक भाषण तो यही दिखाते है की वो खुद को वो भाजपा से अगली पंचवर्षीय के प्रधानमंत्री पद के दावेदार मान चुके है !
     लेकिन अभी भी प्रश्न अनेक है , क्या केवल उनके या आम जनता के सोचने से वो प्रधानमत्री बन जायेगे ??
उनकी राजनैतिक प्रष्टभूमि जो रही है क्या उनके प्रधानमंत्री बनाने के लिए सही   है  ? क्या देश को ऐसा प्रधानमत्री चाहिए जो देश के लिए कभी भी सांप्रदायिक हो सकते है ?
     इन सभी प्रश्नों के आलावा उनके सामने अनेक ऐसे प्रश्न भी है जिन्हें उनकी खुद की पार्टी ने खड़ा किया है , कई बार लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा भाजपा अभी भी उनके स्वप्नों की पार्टी नहीं है , पार्टी के अन्दर ही कई राजनेता उनके प्रधानमंत्री बनाने का खिलाफ है, और खुद नरेन्द्र मोदी क्या अपने राजनैतिक गुरु लाल कृष्ण आडवानी के होते हुये प्रधानमंत्री बनना चाहेगे !





अभी कुछ समय पहले नरेन्द्र मोदी ने इण्डिया टुडे के एक सम्मलेन में कहा- जनता उन्हें बुला रही है , जनता उनसे कह रही है भारत को भी गुजरात बनाना है !
आखिर ये शब्द उन्होंने सुने कहा से , क्या राजनीती में कल्पनाओं में ही सच्चाई है ? यदि देश की जनता उन्हें बुला रही है तो वो पिछले लोकसभा चुनावो में क्यों नहीं आये !  खैर मामला कुछ भी लेकिन मामला संदिग्ध है ! जिस तरह से उन्होंने जल्दी जल्दी में ही बाबा रामदेव , आर.एस. एस. प्रमुख , भाजपा प्रमुख से नजदीकियां बढ़ने की कोशिश की है इससे तो यही लगता है उन्हें प्रधानमंत्री बनने की बहुत जल्दी है और वो इसके लिए खुद को उम्मीदवार भी घोषित कर चुके है !

पीएम हैं हमारे पानी मंत्री ... : दैनिक हिंदी मिलाप स्‍तंभ 'बैठे-ठाले' 22 अप्रैल 2013 में प्रकाशित


नाक-कान की रामकहानी : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स 16 अप्रैल 2013 स्‍तंभ उलटबांसी में प्रकाशित


काश मैं बाबा होता : दैनिक हरिभूमि 14 अप्रैल 2013 के रविवार भारती में प्रकाशित


मुन्‍ना का कुछ तो ख्‍याल करो : डीएलए दैनिक 9 अप्रैल 2013 में प्रकाशित



हजार हाथ वाली सरकार : दैनिक कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस 6 अप्रैल 2013 अंक में प्रकाशित


एक गधे की अनूठी सोच : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स स्‍तंभ उलटबांसी में 1 अप्रैल 2013 अंक में प्रकाशित


एक गधे का सोचनामचा : नेशनल दुनिया के चिकोटी स्‍तंभ में 1 अप्रैल 2013 को प्रकाशित


गरीबी की पहचान : मासिक मिशन पॉलिटिक्‍स के 15 जनवरी से 14 फरवरी 2013 अंक में प्रकाशित


अरे ये तो चिदंबरम बजट था : अंकुर मिश्र 'युगल'

ये बजट देश के लिए था, चिदम्बरम के लिए या कांग्रेस के लिए ये किसी को नहीं पता ? मेरा तो यह कहना है की बजट किसी के लिए भी हो लेकिन आम आदमी के लिए नहीं था ! जिस सरकार द्वारा वादे किये गए थे की विकास दर दहाई के अंको तक पहुचाया जायेगा उसको जनता के सामने लाने पर दहाई के अंको में सरकार खुद फसती नजर आई ! कही ये विकास दर ५-६ के अंक से घटाकर २-३ पर न पहुच जाये ! कहा जाता है इस बार के बजट में सबसे ज्यादा ध्यान छात्रो का रखा गया है लेकिन इस घटती विकास दर में सबसे जयादा भी उन्ही युवा छात्रो के रोजगार को है ! मुद्रास्फीति की बात करे तो देखते है की जिसे दस से नीचे होना चाहए अभी भी वो दस के ऊपर ही है ! मुद्रास्फीति : सरकार के द्वारा खर्च किये गए खर्चो पर निर्भर करता है ! ये दहाई की मुद्रास्फीति अभी भी यही दिखाती है की सर्कार के खर्चो में कोई कटौती नहीं हुयी है ! कटौती हुयी है तो जनसँख्या के उस महकमे में जिसमे ९० % लोग रहते है ! पिछली सरकार से ही देख रहे है किसी चीज में कटौती नहीं देखि गयी है रोजाना प्रयोग के सामान के मुल्य में बध्होत्तरी, सब्जी के मुल्य में बराबर बढ़ोत्तरी , पेट्रोल डीजल , गैस के मूल्यों में बराबर बढ़ोत्तरी , बस बढ़ोत्तरी -बढ़ोत्तरी और बढ़ोत्तरी !! और इस बढ़ोत्तरी से सबसे ज्यादा परेशां होने वाले लोगो में है वो आम आदमी जिनके पास हनकी जीविका के लिए भी पैसे नहीं होते ! उनका क्या होगा ?? निजत न तो सरकार के पास है और न ही विपक्ष के पास ! सरकार के पास इस विकास दर की कमी के कारण तो नहीं लेकिन बताने के लिए ये जरुर है की 'चीन और इंडोनेसिया की विकास दर तेजी से बढ़ रही है' ! क्या उनकी विकास दर सुनाने से हमर पेट भर जायेगा या फिर हमारी विकास दर बढ़ जाएगी ! जिस देश में गुजरात जैसे राज्य अपने आप में विकास की परिभाषा है क्या वह चीन और इंडोनेशिया को देखने की जरुरत है ! क्या देश के अन्दर ही रहकर ऐसे मुद्दों में विचार करने की जरुरत नहीं है ? कुछ भी ऐसे बजट से कांग्रेस के इंडिया ड्रीम का सपना तो पूरा होने वाला नहीं है और यदि आंगे विपक्ष भी सरकार के इस रवैये को ऐसे ही स्वीकार करती रही तो २ १ वी शताब्दी में भी उसे सर्कार बनाने का मौका नहीं मिलेगा ! विकास देश की नहीं आम आदमी की जरुरत है ! और इसमें तो अंत में यही कहा जा सकता है की ये बजट स्विस बैंक के खता धारको को ध्यान में रखकर लाया गया है , इसमे बड़े बड़े उद्योगपतियों का ही ध्यान रखा गया है ! तो इसे आम बजट कैसे कह सकते है ! ये तो चिदम्बरम बजट ही कहलायेगा न ...!!



लगता है 'ओवैसी और कसाब' की सजाओ से काफी दुखी है शाहरुख : अंकुर मिश्र 'युगल'

आज कल के दिनों में देश के नए नए जुमलों को मुद्दों के ऊपर में उठाने की जद्दोजहद बराबर चल रही है ! देश में मिडिया के पास या तो खबरे नहीं है या जो मुद्दे की खबरे है वो दिखाना नहीं चाहते ! उसी का नतीजा है देश में शिंदे जैसे ‘गुंडे’ बिना मतलब में जनता के सामने आ जाते है ! शाहरुख खान जैसे मंद-बुद्धि अपनी खोई हुयी छवि को फिर से बटोरने लग जाते है ! जिस व्यक्ति ने अपने छोटे से परिवार के बाहर निकलकर कभी भी देश के लिए कुछ नहीं किया हो ? फिर भी जिस देश ने उसे सिर पर चढ़ाकर वो छवि दी , जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी ! वो व्यक्ति आज बोलता है उसे उसी समाज से खतरा है ! आखिर इस वक्तव्य का मतलब आम आदमी क्या सोचे ?? मेरे विचार से इस व्यक्ति के अंदर ओवैसी या कसाब जैसे विचार पनप रहे है ! जब उसके सामने उन व्यक्तियों का जनाजा उठा तो कुछ ख़यालात सामने आये ? उसे लगा अब तो इस देश में कुछ हो सकता है ! या फिर , क्या पाकिस्तान के उन भाइयो का ख्याल आ गया जिनके साथ मिलकर आतक फ़ैलाने का कुछ विचार हो ? वैसे भी पुरातन परम्परा है उस पाकिस्तान की , विकास के लिए भीख लेकर तबाही भेजने की ! और आप तो उस पहली हसरत में कामयाब हो चुके है पैसा देश से ले चुके है , तबाही की मुहीम में निकलने का इरादा ....................................................! और हाँ एक बात और याद आती है इस्लाम के जनक कहने वाले ‘ जाकिर नाइक’ के साथ भी आपके कभी अच्छे समबन्ध है ! यहाँ बात उन संबंधो की नहीं है बात है उनके आदर्शो की जो दूसरे धर्मो को हमेशा गलत बताते है ! क्या उनके साथ मिलकर कुछ करने का इरादा तो नहीं है ?? ये आपके वक्तव्य के बाद उत्पन्न हुए एक सामान्य भारतीय के विचार है ! हो सकता है ये बिल्कुल ही निरर्थक हो ! लेकिन ये भी हो सकता है ऊपर की किसी एक बात में एक प्रतिशत भी सच्चाई हो ! भाईसाहब देश में ‘दिलीप कुमार’, नासिर , अमजद खान, जीनत अमान, जावेद अख्तर अदि अनेक ऐसे मुस्लिम कलाकार हुए है लेकिन उन्हें कोई खतरा नहीं हुआ ! ये वो देश है जहा एक अंग्रेज महिला की पार्टी से सिख्ख व्यक्ति को चुनकर देश के मुस्लिम राष्ट्रपति द्वारा शपथ दिलाई जाती है और वो भी वहाँ के लिए जहां ८० प्रतिशत से ज्यादा केवल हिंदू रहते है ! ऐसे देश देश के अंदर एक सामान्य व्यक्ति को खतरा नहीं होता और आप कहते है आपको खतरा है ! आप को बताना होगा आखिर अपके इस बयां के पीछे ख्याल क्या आया ?? यदि यह केवल व्यंग था तो आपने अपने उस खेमे में ठोस पहुचाया है जिअकी जमीं पर अआप खड़े हो ! और अगर इस बात के पीछे कुछ मकसद है तो ..................... उसे देश जानना जोर चाहेगा !! एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी फिल्मो के माध्यम से देश में प्यार की भावना फैलता है उसका वक्तव्य आता है की उसे देश के अंदर ही खतरा है ! आखिर क्यों ? यहाँ इस क्यों के पीछे प्रश्न तो कई है लेकिन उत्तर तो खुद वही दे सकते है !!

वंशवाद से नहीं विकासवाद से चलता है देश : अंकुर मिश्र 'युगल'

आखिर कुछ आच्छा दिखने लगा भाजपा में, एक बुरे दौर से गुजर रही भाजपा ने लोकसभा चुनाव के पहले कुछ अनोखे पहलुओ पर काम करते हुए देश को दिखा दिया की ये किसी परिवारवाद पर चलने वाला दल नहीं है ! वास्तव में जिस देश में दो दलों की ही सरकारी दावेदारी रहती हो , और उसमे भी एक दल ऐसा है जिसे लोकतान्त्रिक दल खा भी नहीं जा सकता ! कांग्रेस, जो अपने आप को देश का सबसे बड़ा दल कहता है और आजादी के बाद सबसे ज्यादा शासन किया है लेकिन मेरे अनुसार यह एक ऐसा दल है जिसने देश में सबसे ज्यादा कुशासन किया है और देश की आजादी के बाद की सभी लड़ाइयाँ गवाह है, पाकिस्तान गवाह है की इस बड़े दल ने देश को क्या दिया है ? एक लोकतान्त्रिक दल में राजतन्त्र जैसा माहौल पैदा करके इस दल ने जिस तरह से तानाशाही भरा शासन किया है, वह अनदेखा नहीं है ? एक दल जिसकी बागडोर हमेशा एक परिवार के हाथो में रही, पार्टी में अनेक महान नेताओ के होते हुए बड़े पदों पार हमेशा ऐसे राजनेताओ को बैठाया गया जिन पर गाँधी परिवार खुद शासन कर सके , मनमोहन सिंह जिसका सबसे बड़े उदहारण है ! पार्टी में अनेक ऐसे बड़े नेताओ के होते हुए ‘राहुल गाँधी’ उपाध्यक्ष का पद दिया जाना और अध्यक्ष का पद खुद सोनिया गाँधी के पास होना किसी लोकतान्त्रिक दल को नही दिखाता, पार्टी में जयराम रमेश, शशि थरूर अवं अनेक ऐसे युवा नेता है जो देश को राहुल गाँधी या गाँधी परिवार से अच्छा चला सकते है लेकिन उन्हें इस दल में ऐसे पद न मिलना किसी तानाशाही को ही दिखा सकता है ! वही देश में दूसरी तरफ एक ऐसा दल है जो अपनी आपसी लड़ाइयो से ही जूझता रहता है, दल मेंकुछ अच्छाइयां है जो इसे कांग्रेस से अलग करती है पहली बात पार्टी में किसी वंशवाद का न होना देश के सभी धर्मो के लोगो को पड़े पदों में बैठालना. इसी दल ने देश को अटल बिहारी बाजपेई जैसे प्रधानमंत्री व् आब्दुल कलम जैसे राष्ट्रपति दिए है ! पड़े पदों में उस व्यक्ति को बैथालना जो उपयुक्त है ! आभी वर्तमान में नितिन गडकरी को हटाकर राजनाथ सिंह को अध्यक्ष बनाना इस बात को ही दिखता है को भाजपा केवल आर. एस . एस. के इशारों पर नहीं चलत और जारुरत पडने पर उसका साथ भी नहीं छोडती ! यह भाजपा का समर्थन नहीं था बल्कि वह सच्चाई थी जिसे देश बराबर नजरंदाज कर रहा है, जानते हुए भी अपना भला करने में असमर्थ है ! एक विकाशशील देश को दशको से वही पर खड़ा किये है ! देश वंशवाद , जातिवाद , आरक्षण, भरष्टाचार से नहीं चलता देश बढ़ता है विकास से और हम विकास नहीं निकास कर रहे है एक साच्ची बात से !

ओवैसी प्रश्न तो बहुत है , सामने होता तो जरुर पूंछता : अंकुर मिश्र ‘युगल

'ओवैसी’ के पागलपन को आखिर हिंदुस्तान किस तरह स्वीकारे ? वह व्यक्ति जिसे जनता के बहुमत से सरकार का हिस्सा बनाया गया है उसके वक्तव्यों को १२५ करोड़ की जनता किस रूप में स्वीकारे !
उसने देश के हिन्दुओ को ही अनादरित नहीं किया उसने तो उन सच्चे मुसलमानों का भी आपमान किया है जिनका मुस्लिम धर्म खुद सिखाता है दूसरे धर्मो की इज्जत करना !
और कब तक इरादा है बातचीत से काम चलने का , एक तरफ शांति का के लिए क्रिकेट मैच होता है वही दूसरी ओर भारतीय सिम के अंदर घुसकर अपनी नामर्दानगी की ताजपोशी करता है हमारा पडोसी देश ! हमने जिसे हमेशा अपनी मौसी का दर्जा दिया है, हमने जिस देश की हरकतों को हमेशा नासमझ समझकर माफ़ किया , जिसके लिए हमेशा हमने शांति का पथ पढ़ा है आज वही भाई फिर से अपनी तुच्छ हरकतों पर उतर आया है ! सोते हुए सैनिको को मारना कही की मर्दानगी या जज्बा नहीं होता ! जज्बा दिखाना है तो बोलकर देखो एक बार ! हम शांत है ये हमारी सराफत है , कमजोरी नहीं ! वाही दूसरी तरफ हमारी ही मिट्टी में रहकर हमें ही दोषी ठहराने वाले उस ओवैसी के लिए तो कसाब की सजा भी कम है ! वैसे तो हमने कभी जताया नहीं है फिर भी यदि जबाब सुनने का मन है तो देश १०० करोड़ हिंदू नहीं बल्कि एक सच्चे दिल के मुस्लमान से ही पूंछ लो नासमझ ‘ओवैसी’ वो तुम्हे बता देगा की तुम्हारा खुद का धार्मिक स्टार कितना गिरा हुआ है !
तुम किस कसाब के लिए बात कर रहे हो जो खुद को दोषी ठहरा चूका था !
१०० करोड़ हिन्दुओ का मुकाबला तुम २५ करोड़ मुसलमानों से करोगे ?? अरे पहले अपने उन २५ करोड़ मुसलमानो से तो पूंछ लो क्या वो तुम्हारे साथ है ? चंद किराये के टट्टुओ को इकठ्ठा करके तालियाँ बजवाना शक्ति प्रदर्शन नहीं होता !
ओवैसी तू हिन्दुओ के भागवानो की बात करता है, यही हजारों भागवान तेरे २५ करोड मुसलमानों की जीविका बनाते है ! खैर तू इतना समझदार नहीं है अपने उन भाहियो की भावनाओ को समझ सके !
तू बाबरी मस्जिद की बात करता है ? तू ताजमहल की बात करता है ? तू लालकिला, जामा-मस्जिद यहाँ से लेकर जायेगा ? ............... क्या ये सब करने में तेरे साथ और कोई होगा ?
ऐसे ही अनेक प्रश्न है तुझसे , तू सामने होता तो एक पत्रकार और लेखक की हैसियत से जरुर पूंछता ! दिल में एक और तमन्ना है यदि तू सामने होता तो हिन्दुस्तानी होने के नाते एक ‘थप्पड़’ जरुर लगाता, ये एक हिंदू होने के नाते नहीं होता बल्कि ये एक मानुषी होने के नाते होता ! शायद उससे एक जानवर रूपी शारीर में कुछ फर्क पड़ता !

धार्मिकता या शर्मिंदगी : अंकुर मिश्र ‘युगल’

धार्मिकता या शर्मिंदगी ?? जब देश एक गंभीर समस्या से गुजर रहा है जहां एक बेबस और लचर लड़की ने अपनी जान गवाई, जिसके लिए कानून और सरकार सुधार के रस्ते ढूड रहे है ! देश के हर कोने में प्रार्थना सभाए हो रही है की भविष्य में ऐसी दरिंदगी न हो ! एक लड़की को कुछ दरिदे घेरकर देश के सामने एक दरिन्दागी की नीव रखते है जो पुरे देश के लिए शर्मनाक है ! सभी ऐसे कामो के न होने की प्रार्थना करते है और उन दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की पेशकस करते है ! खुद देश के पूर्व न्यायधीश ने खा की ‘अपराध सजा देने से कम होते है सजा की कठोरता बढ़ाने से नही’ , और यह सत्य भी है एक महीना से ऊपर होने वाला है इस अत्याचार को लेकिन अभी तक उन दरिंदों को कोई सजा नहीं मिली है ! लेकिन इस बिच अनेक ऐसे बलात्कार के मामले सामने आये जो दिल दहला देने वाले थे ! आखिर इसका मतलब क्या समझा जाये, उस नादान की मौत का कुछ भी असर नही हुआ इन हैवानो पर या फिर वो ये दिखाना चाहते है की हमारे देश की कानून व्यावस्था कितनी लाचार है ! लोग कहते है “ वो तो सो गयी , लेकिन हमें जगा गयी” तो वो जाग्रति कहा है ? इसके आलावा देश के धार्मिक और हिंदुत्व के पालनहर काह्लाने वाले बापू आशाराम और राष्ट्री स्वयं सेवक संघ के मोहन भागवत के वक्तव्यों को क्या समझा जाये जो इस समस्या का समाधान का हिस्सा न बनकर बल्कि उस लड़की को दोषी ठहरा रहे है ! आखिर इन ढोगियो को अध्यात्म गुरु की संज्ञा ही क्यों दी जाती है देश हित में बात नहीं कर सकते तो कम से काम अहित की बात तो न करे ! आखिर उनकी सोच का नजरिया क्या है ?? जिस लड़ाई में समाज की सबसे ज्यादा भूमिका होनी चाहिए उस समाज के सब्भ्रांत लोग ही ऐसे वक्तव्य देते है , इनकी जिम्मेदारी का सूचक है या मानसिक असंतुलन का ! कुछ भी हो देश की इस अहम लड़ाई में समाज की जागरूपता सबसे ज्यादा जरुरी है और दूसरा यह की इन मानसिक असंतुलित ढोगियो को नसीहत देने की जरुरत नहीं है ! अब तक लड़े है , अब भी लड़ेगे ! कल तक खड़े थे , आज भी खड़े है ! अब नहीं है वो तो क्या हुआ ? उसकी शक्तियां हम पर है दुआ !!

‘सचिन और आडवाणी’ दोनों को जरुरत है सन्यास की : अंकुर मिश्र ‘युगल’

देश को अपने-अपने क्षेत्र में महान उपलब्धिय दिलाने वाले दो महानायक सचिन और अडवाणी, आज प्रत्येक देशवाशी के लिए समस्या बने हुए है ! क्रिकेट के लिए उपलब्धियां की मशाल रचने वाले सचिन ने देश के लिए जो क्रिकेट में योगदान दिया है वह वास्तव में सराहनीय है ! एक् १६ साल के लड़के ने जिस तरह से क्रिकेट में आकर देश को वो उपलब्धि प्रदान की जिसके लिए टीम तरश रही थी, इसके पहले टीम में गावस्कर , कपिल देव और बिशन सिंह बेदी जैसे खिलाड़ी तो थे लेकिन इन सबके बावजूद क्रिकेट में भारत का विश्वमानचित्र में कोई आस्तित्व नहीं था, खिलाड़ी तो खेलते थे लेकिन जीतने के लिए नहीं, केवल हार से बचने के लिए ! लेकिन इस महानायक के आते ही विश्व के गेंदबाजों के छक्के छूट गये ! टीम ने २००७ में २०-२० विश्वकप जीता, २०११ में विश्वकप जीता और हजारों के तादात में रन बना डाले, इनके हर रन के साथ एक् नया रिकार्ड बन जाता है ! लेकिन अब इस बल्लेबाज का पदार्पण उस उम्र में हो चूका है, जिस पर किसी भी क्रिकेटर का खेलना नाजायज है , आलोचक प्रतिदिन नए-नए शब्द ढूढते है, और सत्य भी है विश्व के किसी भी क्रिकेटर ने इस उम्र तक क्रिकेट नहीं खेला, और इसीलिए जरूरत है इस महानायक को सन्यास लेने की जिसके बाद टीम में युवाओ को मौका मिल सके ! वही दूसरी ओर है राजनीती के महानायक लाल कृष्ण आडवानी, जिन्होंने जनता पार्टी को तब संभाला जब भारतीय राजनीती में इस पार्टी का कोई अस्तित्व भी नहीं था , कोई भी इसे स्वीकारने को तैयार नहीं था, नब्बे के दसक में इस पार्टी को लोकसभा चुनाव में २ सीटे ही मिल पाई, लेकिन अगले ही चुनाव में जिस तरह से आडवाणी का हिंदुत्व का जादू चला, ऐतिहसिक है ! इनके पहले पार्टी में नेता तो थे लेकिन उनका आस्तित्व नहीं था , राममंदिर का मुद्दा केवल मुद्दा बना हुआ था, इस महानायक ने हिंदुत्व के लिए जो जागरूपता देश भर में लायी वो वास्तव में सराहनीह है ! उनकी रथ यात्रा में वो जादू चला की अगले ही चुनाव में पार्टी ने इतिहास रच डाला, और देश को अटल बिहारी बाजपेयी जैसे प्रधानमंत्री दिए ! लेकिन वो अभी भी प्रधानमंत्री के प्रतीक्षा सूचि में है और भाजपा के भावी प्रत्यासी बने हुए है ! पार्टी में सुषमा स्वराज , अरुण जेतली और नरेन्द्र मोदी जैसे भावी नेता है लेकिन इन सबके बावजूद इस पार्टी में आज की जो खलबली है, वो पार्टी के भविष्य में खिलाफ है ! समस्या एक् है इस महानायक जिनकी उम्र ८० वर्ष से ज्यादा है और फिर भी पार्टी को जकडे हुए है ! समस्या दोनों के साथ एक् जैसी है, हिंदुत्व के महानायक और क्रिकेट के बादशाह दोनों की उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता पर आज के आज की जरुरत है दोनों के सन्यास की ! इनका सन्यास ही आज के भारतीय क्रिकेट और भाजपाई राजनीती का हल हो सकता है !

वालमार्ट के पास है दो ही विकल्प , रुकेगा या लूटेगा : अंकुर मिश्र


इतिहास गवाह है भारत में जितने भी विदेशी आये है उनके पास केवल दो ही विकल्प थे : उन्होंने या देश को लूटा है या फिर यही पर बस गए है ! मुग़ल शासको ने देश में आक्रमण किया लेकिन उनकी नीति देश को लुटाने की कभी नहीं थी, उन्होंने यही बसकर अपने परिवार के साथ जीवन यापन किया ! लेकिन वाही यदि हम अंग्रेजो के शाशन काल में नजर डाले तो विपरीत था , उन्होंने देश में आना इसलिए उचित समझा क्योंकि हम सोने की चिड़िया थे और हमें खोखल करना उनका लक्ष्य था जो उन्होंने किया और बाद में किसी अंग्रेज शासक ने ये भी लिख दिया की हम तो मुठ्ठी भर लोग आये थे भारत से एक् पत्थर ही कफी था हमें भागने के लिए, लेकिन अब कोई क्या कर सकता है उस अंग्रेज का और हमारे जैसे भारतवासियों का जो उन नेताओ के गुलाम बनकर बैठ जाते है जीनको वो खुद चुनकर भेजता है ! जिस तरह से किसी समय में पेप्सी और कोक ने देश में पदार्पण किया था और हम नेताओ की सुनते रहे थे और हसते हसते आज गुलाम बन बैठे है इसी तरह हो सकता है वालमार्ट भी एक् दिन हमारा राजा बन बैठे लेकिन ऐसी केवल कल्पना की जा सकती है ! हमारे नेताओ में संसद में जिस तरह से वालमार्ट को लेन की जद्दोजहद की वो वास्तवमें सराहनीय है, विरोध करने वालो की कुतर्क और पक्ष में होने वालो के तर्क अब तक जनता के समझ में नहीं आये ! जिस वालमार्ट को जनता के लिए लाया जा रहा है उस जनता से तो एक् भी बार नहीं पूंछा गया की ये आना चाहिए या नहीं ! राज्यसभा और लोकसभा के अंदर आपस में आंखमिचौली खेलकर एक् और प्रधितना की जंजीर जकड दी नेताओ ने देश पर ! और सबसे सरल बात तो यह है की ईस्ट इण्डिया कंपनी ने कोलकता से पदार्पण किया था तो उसे दिल्ली तक आने में समय लगा लेकिन इस वालमार्ट का पदार्पण तो दिल्ली से ही हो रहा है तो उसे तो और सरलता होगी अपने लक्ष्यों को पाने में ! वो चाहे तो देश में रुक सकता है या फिर लूट कार यहाँ से जा सकता है ! भारत के अंदर अभी तक व्यापारिक कंपनियों ने दो ही रवैये अपनाए है, अब सोचना वालमार्ट को है ! अभी एक् नए दल आम आदमी के मुखिया ने कहा की वालमार्ट के लिए जन-मत होने चाहिए, उन्हें तो जनता के बारे में यही सोचना चाहिए जिस देश में कसाब और अफजल गुरु जैसे आतंकवादी को सालो तक मेहमान बनाकर रखा जाता है , भ्रष्टाचार को रोकने लिए कोई कड़ा कानून नहीं होता, पेप्सी और कोक जैसी बाहरी कंपनियों का शाशन होता है वहाँ इस वालमार्ट के लिए कैसा जनमत ! यहाँ तो यह कहना अनुचित नहीं होगा की जनता का जनमत केवल एक् दिन होता है चुनाव में और उसी दिन उसकी कीमत होती है उसके बाद या पहले जनता केवल और केवल नेताओ की नौकर(सेवक) होती है! इस देश में कैसा जन-मत ! यहाँ आज जन-मत की कीमत होती तो क्या करोड़ो के घोटाले करने वाले कलमाड़ी , यदुरप्पा जैसे नेता जिन्दा होते है ! जनता का काम है सर्कार द्वारा थोपे गए कानूनों पर अम्ल करना ! उनके द्वारा आपस में आरक्षण औअर क्षेत्रवाद की राजनीती में हिस्सा लेना बस !
 
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