नया दिन नया उपहार : कविता है सद्कर्मों का व्‍यापार

उठो उठो जल्‍दी चाहे मत उठो
पर उठो सुबह सुबह समय से
पहले दिन ही मत बहाने गढ़ो
पढ़ो फेसबुक स्‍टेटस समय से
सोए देर से थेयह बहाना है
सर्दी है तो क्‍या हुआ नहाना
न नहाना अच्‍छा नहीं बहाना
पानी शरीर पर खूब है बहाना



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और जुटे हैं बंधु पानी बचाने की मुहिम में

नया साल आया है, नहा लूं या पानी मैं बचा लूं

इन कोशिशों को सलाम करूं


या बाहर हो रही शुभकामनाओं की बरसात में अपने तन मन को भिगो लूं 

और इंतजार अभी बाकी है दोस्‍त

ग्‍यारह, बारह और तेरह : अब तेरह का इंतजार है


 
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