सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर न रोक, न ठोक - बस जरा सी टोक


http://www.facebook.com/avinashvachaspati

एक ऐसी आजादी जो अराजकता बनती जा रही है जबकि चंद विवेकहीन लोग ही इसके लिए जिम्‍मेदार हैं। मेरा तो यह कहना है फेसबुक को सेफबुक बनाने के या अन्‍य ऐसी साइट्स के जरिए अभिव्‍यक्ति की आजादी के नाम पर अराजकतावादी माहौल न बने, इसके लिए इनमें पंजीकरण करने व खाता खोलने के लिए वैध पहचान पत्र की पूरी जानकारी और उसकी स्‍कैनप्रति भेजने की अनिवार्यता कर दी जानी चाहिए। बिल्‍कुल उसी प्रकार जिस प्रकार पासपोर्ट, राशन, वोटर, आधार, बैंक खाता, ड्राइविंग लाईसेंस इत्‍यादि की अनिवार्यता होती है। इसके साथ कम से कम आयु सीमा और चित्र की जरूरत भी होनी चाहिए और इसके बिना तो खाता खोला ही न जाए। इन अपेक्षाओं को पूरा न करने वालों का इन सोशल नेट‍वर्किंग साइट्स पर रजिस्‍ट्रेशन होना ही नहीं चाहिए। इससे आप देखेंगे कि आधी से अधिक समस्‍या का हल तो यूं ही चुटकियों में हो जाएगा। फिर भी इससे पूरी समस्‍या से बचा नहीं जा सकेगा इसके लिए एक नियम और भी हो कि रजिस्‍ट्रेशन के कम से कम पन्‍द्रह दिन के बाद खाता सक्रिय हो और इस अवधि में सोशल साइट्स का प्रबंधन जमा कराए गए दस्‍तावेजों का अपने स्‍तर पर ऑनलाईन सत्‍यापन अवश्‍य करा ले।

हिंदी चिट्ठों (ब्‍लॉगों) की लोकप्रियता बढ़ रही है लेकिन इसमें भी बेनामी या छद्मनामधारी प्रवेश पा चुके हैं। इन्‍हें भी फिल्‍टर किया जाना चाहिए। उपरोक्‍त नीति ही किसी भी भाषा के ब्‍लॉगों के निर्माण में जरूरी कर दी जाए। आरंभ में तो ऐसा महसूस होगा कि इससे अंतर्जाल में सक्रियता में कमी आई है परंतु जल्‍दी ही इन सब में एक स्‍वस्‍थ माहौल का निर्माण होगा जिससे वास्‍तविक रचनाकारों को प्रोत्‍साहन मिलेगा और इससे कापीराइट के उल्‍लंघन की समस्‍या से भी कुछ हद तक निजात मिलेगी। किसी के भी ब्‍लॉग से किसी भी सामग्री को अपने नाम से प्रकाशित करने के मामलों में निश्चित ही रोक लगेगी।

इसका यह हल बिल्‍कुल ठीक नहीं है कि हम तकनीक के खतरों से डर कर उस पर सरकारी प्रतिबंध ही लगा दें। अपितु इसके लिए ऐसी स्‍वस्‍थ नीतियों और अनुकूल नियमों को लागू करें जिससे इसमें शामिल होने वालों को सुरक्षा का अहसास हो सके। इससे उन फर्जी खातों में भी कुछ सीमा तक कमी आएगी जो आतंक फैलाने के लिए इन माध्‍यमों का दुरुपयोग कर रहे हैं।

6 comments:

SM said...

nice post
if i fear the machinery, i am afraid to speak i am suffered injustice, then in such situation what i should do?

Every good site got the procedure to remove content use it.

This is done for the publicity.
Plan is to bring and restrict the freedom of speech.

प्रवीण पाण्डेय said...

विचारणीय विषय...भविष्य सोचना होगा।

mukeshjoshi said...

ये कतई जरूरी नहीं की, सरकार अपनी तकनीकी या प्रबंधन मर्यादा ओ के लिये, किसी भी ,ब्लॉग, या वेब साइट पर सीधा प्रतिबंध लगादे, सरकार को उचित रास्ता खोजना चाहीये,

शिवम् मिश्रा said...

सहमत हूँ आपसे ... अगर सबको को बचाना है तो ऐसा कुछ ना कुछ कदम तो उठाना ही होगा !

kuldip said...

My Take::http://kuldipgupta.blogspot.com/2011/12/freedom-of-press.html

नुक्‍कड़ said...

कुलदीप जी, माना कि आप बहुत बड़े विद्धान हैं लेकिन आप टिप्‍पणी बक्‍से में आते हैं और सीधे मुझे और मेरे पाठकों को बलात् खींचकर अपने चिट्ठे पर ले जाना चाहते हैं। अपने चिट्ठे पर ले जाना गलत नहीं है परंतु जबर्दस्‍ती तो किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। नैतिकता का तकाजा तो यह बनता है कि आप पहले इन विचारों पर अपने बहुमूल्‍य और अनमोल विद्धतापूर्ण विचार प्रकट करते और फिर आग्रह करते कि आप मेरे चिट्ठे पर भी आमंत्रित हैं। आप आए, आपका आभारी हूं परंतु क्‍या आप इस आने को ठीक समझते हैं। मान लो कि आपके चिट्ठे पर पाठक आएं और वह भी अपने चिट्ठे की कड़ी आपके टिप्‍पणी बॉक्‍स में चिपका कर चले जाएं, इससे जरूर आपका मन प्रसन्‍नता प्राप्‍त करेगा, इसमें मुझे संदेह है। विश्‍वास है कि भविष्‍य में आप इस प्रकार की धृष्‍टता से बचेंगे। इसी प्रवृत्ति से हिंदी चिट्ठाकारी का नुकसान हुआ है और हम हैं कि इसे ही आंख मूंद कर अपना रहे हैं, मानो कि परदा हाथी की मूर्तियों पर नहीं, इंसान की अक्‍ल पर पड़ा हुआ है।

Post a Comment

विचारों का खुल गया ताला
स्‍वीकारता सब सच तेताला

 
Copyright © 2009. तेताला All Rights Reserved. | Post RSS | Comments RSS | Design maintain by: Shah Nawaz