एक हिंदी ब्‍लॉगर ने गधे पर कविता रच दी : गधा कहता है मैंने लिखी है


गधा तो गधा है
सींग नहीं हैं तो
क्‍या चिंता
निश्चिंत है
कान खड़े हैं
सींग से बड़े हैं
नहीं हैं तीखे
चरपरे हैं

गधे के कान
कोई नहीं खाता
गधा ही चिल्‍ला
चिल्‍ला कर सबके
कान करता बंद

गधा सीधी टांग से
खुजाता है कान
उसे सींग और कान
की अद्भुत है पहचान

इंसान नहीं पहचानता
गधे को, घोड़े को
उल्‍लू को, आदमी को
और बिल्‍कुल नहीं
फेसबुकिए को पहचानता

पर मानता है
चाहता है कि
इंसान हो
इंसान का मित्र

इसलिए तो बना
रखा है ठिकाना
अंतर्जाल पर फिक्‍स
कहते हैं जिसे फेसबुक।



विशेष :गधे और अविनाश वाचस्‍पति में तकरार है, गधा कहता है मैंने लिखी है, कवि कहता है मैं कवि हूं। पाठक ही फैसला करें। तब तक गधे और अ.वा. हौसला रखे हुए हैं। 

13 comments:

Sushil said...

सरासर झूट है मैने बिल्कुल भी नहीं कहा कि मैने लिखी है ।

नुक्‍कड़ said...

मुझे सुशील कुमार जोशी की टिप्‍पणी के अंतिम तीन शब्‍द पसंद हैं, मैंने उनका चयन कर लिया है 'मैंने लिखी है'

संतोष त्रिवेदी said...

सबसे बड़े गधे तो हम ही निकले,
जिसने गधे द्वारा लिखी कविता बांच ली.

...पर ये आदमी कब लिखेगा कविता..?

प्रवीण पाण्डेय said...

आजकल तो इसी बात की होड़ लगी है कि किसने लिखी, उन पर लिखी कविता पर उनका अधिकार पहला है..

mukeshjoshi said...

जब आँखों पर छा गया बेताला ,
तब एक गधे पे चढ़ गई तेताला,
ये अजब किस्म की भूख हे,
या समजो उसका खुला मुख हे,
ये जोर जोर से जब चिल्लाये,
गली महोल्ला सर पे उठाये,
सिंग बग़ैर ही सब के कान फोड़े,
अच्छों- अच्छों को दु-लत्ती से तोड़े,
एक डॉक्टर से सांठ -गाँठ हे उसकी,
मास्टरों से करता हे वो कुस्ती,
फेसबुक छोड़ उसे हे संसद में जाना,
अपने परिवार को गले लगाना,
मास्टर जी अब इसे भी पढ़ा ओ,
हो शके तो संसद में छोड़ आ ओ,
वहा वो दु-लती खेलेगा,
अपनो में हिच-कोले लेगा,

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

काका हाथरसी की एक रचना याद आ रही है

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं,
जिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं।
गधे हंस रहे हैं आदमी रो रहा है।
हिंदुस्ता में ये क्या हो रहा है।

हाहाहहाहा

रविकर फैजाबादी said...
This comment has been removed by the author.
रविकर फैजाबादी said...

कान खोलकर सुन रहा, बिरादरी की बात |
हुक्का-पानी बंद हो, सुन कविवर अभिजात |


सुन कविवर अभिजात, बेच जीवन भर भाषण |
सोनी माया बोथ, हमेशा ली प्रीकाशन |


जाती यू पी हार, हकाले भरी दुपहरी |
इसीलिए अविनाश, कवि संग लेते तफरी ||

रविकर फैजाबादी said...

उत्कृष्ट प्रस्तुति ।।



इस प्रविष्टी की चर्चा बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी !

सूचनार्थ!

कमल कुमार सिंह (नारद ) said...

गदहा और कवी मे हुई एक दिन लड़ाई,
दोनों मिले कान खिचने लगते थे वो भाई,

लगते थे वो भाई मजा दोनों पाते,
लिखे गधा या कवी, गालिया खाते,

बहुत बढ़िया लगी , मजा आ गया ....

Manu Tyagi said...

अच्छा चिंतन है

Amit Sinha said...

Kaafi achchha hai.. Apne anubhav ke aadhaar par mere hindi blog ko bhi review pls kijiye...

http://mynetarhat.blogspot.in/search/label/Nepura

S.N SHUKLA said...

बहुत खूब , शानदार प्रस्तुति.

कृपया मेरी नवीनतम पोस्ट पर पधारकर अपना शुभाशीष प्रदान करें , आभारी होऊंगा .

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