दिल्ली के आसमान में
बादलों के पीछे
मटके इकट्ठे हो गए हैं
उनकी मीटिंग चल रही है
देखो आकाश की ओर
रंग आसमां बदल रहा है
अभी तो खाली हुए हैं मटके
बादलों में उलीच दिया है
सारा पानी
अब बस एक मटका
फूटने भर की देर है
शाम से पहले
आज दिल्ली में
हुआ अंधेरा है
जहां अंधेर होता है
वहां अंधेरा जरूर होता है
फिर भी नहीं छिप पाता
अंधेरा
चाहे डाले उजाला
कितना ही घेरा
नीचे सड़कों को
पड़े हुए हैं जान के लाले
गड्ढों को बचाने के लिए
गड्ढों में से गड्ढों को
कौन निकाले
कौन बचाए नालियों की जान
जो थोड़ी देर में डूबने वाली हैं
सड़कों के पानी में डूबेंगे वाहन
चारों ओर होगा भीगा भीगा
मौसम
देखेंगे आप
भीग रहा है पानी
यही तो असली
जिंदगानी
जिसमें मिले
भरपूर पानी।


2 comments:
वाह....
बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना.
सादर
अनु
बादल मटकों में घुस जायेंगे तो मटके कहाँ तक बचेंगे..
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विचारों का खुल गया ताला
स्वीकारता सब सच तेताला